• This article describes how social-media companies have cleverly stifled freedom of expression during COVID-19.

  • The basic psychology course covered the focus group discussion that was the basis for this study’s
    backdrop. The three groups of students debated the three topics, which included educational psychology
    from the level of basic education programs through senior secondary education [general and vocational]
    in the Indonesian educational system.…[Read more]

  • Since the global society and existence cycle constantly runs with unpredictable causes and nuance, i.e., social class segregation is always in front of both modest and powerful nations, it even changes quickly with the scheme fluctuation and being dynamic.

  • यह बिहार के पत्रकार उपेंद्र कश्यप की किताब “आंचलिक पत्रकारिता के तीन दशक” की प्रस्तावना है।

    उपेंद्र कश्यप की किताब हिंदी प्रिंट मीडिया के उस विशाल तहखाने की सच्चाइयों को उजागर करती है, जिसे क्षेत्रीय पत्रकारिता के नाम से जाना जाता है। वे उन कारणों के विस्तार में उतरते हैं, जिसके कारण समाज का प्रबुद्ध वर्ग इस पेशे को बिकाऊ, दलाल आदि क…[Read more]

  • प्रभाष जोशी की बौद्धिकता आजीवन अंतत: किसके पक्ष में रही? एक आदमी जो अन्यत्र किंचित तार्किक था, क्यों सामाजिक समानता का आग्रही नहीं बन सका? वर्ण-व्यवस्था का समर्थन कर उन्होंने गांधीवाद का विकास किया उसकी अवैज्ञानिकता को ही प्रमाणित किया? भारतीय प्रभुवर्ग की गुलामी उन्होंने क्यों स्वीकार की? सिर्फ इसलिए कि वह इन्हीं के बीच पैदा हुए थे?

    इस संस्म…[Read more]

  • जीतन राम मांझी, एक भारतीय राजनेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री हैं। वो राजनीतिक पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के नेता के तौर पर 23वें मुख्यमंत्री रहे। मांझी बिहार राज्य में दलित समुदाय के तीसरे मुख्यमंत्री रहे। 20 फरवरी 2015 को उन्होनें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। यह पुस्तक उनके व्यक्तित्व और उनके कार्यों पर आधारित है।
    बहुजन…[Read more]

  • प्रमोद रंजन द्वारा संपादित पुस्तक “महिषासुर एक जननायक” का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि आखिर महिषासुर नाम से शुरू किया गया यह आन्दोलन है क्या? इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके निहितार्थ क्या हैं? इस पुस्तक में प्रश्न उठाया गया है कि जब असुर एक प्रजाति है तो उसकी हार या उसके नायक की ह्त्या का उत्सव किस सांस्कृतिक मनोवृत्ति का परिचायक…[Read more]

  • ‘भारत के राजनेता’ शीर्षक शृंखला की यह किताब भारत में पसमांदा आन्दोलन के सूत्रधार तथा राज्यसभा सांसद ‘अली अनवर’ की संसदीय सहभागिता और संसद में सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर उनकी पहलों पर केंद्रित है। संसद में विविध मसलों पर उनके वक्तव्यों, दर्ज भाषणों, हस्तक्षेपों, स्पेशल मेंशन तथा साक्षात्कार के माध्यम से उनके सरोकारों को समझने की गंभीर कोशिश य…[Read more]

  • भारत के राजनेता शीर्षक शृंखला की यह किताब महाराष्ट्र के राजनेता, आरपीआई(अ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा राज्यसभा सांसद ‘रामदास आठवले’ की संसदीय सहभागिता और संसद में सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर उनकी पहलों पर केंद्रित है। आठवले महाराष्ट्र में सामाजिक न्याय मंत्री के रूप में अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर पिछले तीन दशक से राज्य और केंद्र की राजनीति में अप…[Read more]

  • व्हाट्सएप ने 4 जनवरी, 2021 को अपनी नई सेवा शर्तें जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि व्हाट्सएप का इस्तेमाल करने वालों का डेटा उसकी पैरेंट कंपनी फ़ेसबुक से संबद्ध पाँच कंपनियों को भी उपलब्ध कराया जाएगा और जो उपभोक्ता इन सेवा शर्तों के लिए 8 फरवरी तक सहमति नहीं देंगे, उनकी सेवाएँ बंद कर दी जाएँगी। इस सूचना के आते ही दुनिया भर में खलबली मच गय…[Read more]

  • जाति और पितृसत्ता ई. वी. रामासामी नायकर के चिंतन, लेखन और संघर्षों की केंद्रीय धुरी रही है। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि इन दोनों के विनाश के बिना किसी आधुनिक समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है।
    जाति और पितृसत्ता के संबंध में पेरियार क्या सोचते थे और क्यों वे इसके विनाश को आधुनिक भारत के निर्माण के लिए अपरिहार्य एवं अनिवार्य मानते थे? इन प्रश्नों…[Read more]

  • सच्ची रामायण, पेरियार ई. वी. रामासामी की बहुचर्चित और सबसे विवादास्पद कृति रही है। पेरियार रामायण को एक राजनीतिक ग्रंथ मानते थे। उनका कहना था कि इसे दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज ठहराने के लिए लिखा गया और यह गैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व का उपकरण है। यह किताब हिंदी में 1968में ‘स…[Read more]

  • ARTICLE SEARCH ONLY USES GOOGLE SCHOLAR WITH THE ARTICLE’S PUBLICATION PERIOD LIMITED 2022-2023. THE
    FIRST IS THAT [LIST OF LITERATURE] MUST INPUT THE ARTICLE’S [URL/ONLINE ADDRESS] AFTER THE ARTICLE TITLE
    [ARTICLE TITLE/ENTER/AND PASTE THE URL]. WHILE THE WORKING TIMELINE BEGINS WITH THE SHARING AND
    COLLECTING OF THIS WORKSHEET ON JANUARY…[Read more]

  • Occlusion is most commonly presented as an aspect of certain genres: occluded genres. Here, occlusion is proposed as a property of the processes by which genres are taken up. While routine use of genres creates expectations around when the genre’s uptake is commonly occluded, such expected practice can be subverted by deliberate disclosure. O…[Read more]

  • प्रमोद रंजन का ‘विश्वास का धंधा’ शीर्षक यह लेख हिंदी दैनिक जनसत्ता के 30 अगस्त, 2009 के अंक में प्रकाशित हुआ था। इस लेख के प्रकाशन के बाद हिंदी पत्रकारिता में जातिवाद के सवाल पर बड़ा विवाद हुआ था।

    इससे संबंधित घटनाक्रम इस प्रकार था: प्रमोद रंजन का उपरोक्त लेख उनकी पुस्तिका ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ में संकलित भी था। उस पुस्तिका की भी ब…[Read more]

  • The purpose of this study is to determine if there is a relationship between self-directed learning and academic achievement among second year BEED students at UM Peñaplata College. This particular study has used the quantitative–descriptive correlational design to determine the level of self-directed learning in terms of le…[Read more]

  • This study aimed to determine the perceptions of the selected students who have learning difficulties in science and their teachers regarding the effectiveness of using Strategic Intervention Material (SIM) in science. A qualitative phenomenological approach was employed to explore and describe the perceptions of the teacher and students. There…[Read more]

  • यह लेख प्रभाष जोशी के लेख ‘काले धंघे के रक्षक’ के प्रत्युत्तर में लिखा गया था, जो हाशिया नामक ब्लॉग पर सितंबर, 2009 में प्रकाशित हुआ था।

    इससे संबंधित घटनाक्रम इस प्रकार था : प्रमोद रंजन रंजन का लेख ‘विश्वास का धंधा’ हिंदी दैनिक जनसत्ता के 30 अगस्त, 2009 अंक में संपादकीय पृष्ठ पर छपा था। प्रभाष जोशी जनसत्ता के संस्थापक-संपाद…[Read more]

  • मीडिया में हिस्सेदारी से मेरा आशय केवल मीडिया की आन्तरिक संरचना में हिस्सेदारी से नहीं है। मेरा मतलब है कि वंचित तबकों की अभिव्यक्ति की कितनी हिस्सेदारी है उसमें। उसकी एक भूमिका के तौर पर मैंने कुछ काम किया था यह देखने के लिए कि कितने लोग हैं वंचित तबकों के मीडिया में। उससे यह जुड़ता है। हमारे सामने सवाल है कि हिन्दी-…[Read more]

  • Wissenschaftler und Denker haben sich widerstandslos für die Durchsetzung der herrschenden Corona-Agenda einspannen lassen.

    Der durch das Coronavirus veranlasste Lockdown hat nicht nur unsere körperliche Freiheit ausgehöhlt, sondern auch unsere geistige Freiheit untergraben. In vielen Ländern wurde für das Denken Käfighaltung angeordnet. Offen…[Read more]

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Ted Remington

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