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Pramod Ranjan deposited परिवर्तन के चार साल in the group
Political Philosophy & Theory on Humanities Commons 2 years, 9 months agoफरवरी, 2010 में प्रकाशित इस लेख में बिहार की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को रेखांकित किया गया है, जिसके कारण वंचित तबकों से आने लोगों का उत्पीड़न हो रहा था। लेख में इसके लिए तत्कालीन नीतीश कुमार की सरकार को दोषी बाताया गया है।
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Pramod Ranjan deposited “बचपन की वे छवियां मुझे जीवन के जादू की ओर खींचती हैं” in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 2 years, 9 months agoहिंदी कथाकार राजकुमार राकेश और प्रमोद रंजन की यह लंबी बातचीत शिमला में जनवरी, 2003 में हुई थी, जिसे वर्ष 2007 में पटना के मंडल विचार प्रकाशन ने एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया था। इस बातचीत में जादूई यथार्थवाद, मार्क्सवाद, दलित विमर्श तथा लेखक और सत्ता के बीच संबंध जैसे मुद्दे प्रमुखता से आए हैं।
पटना से जाबिर हुसेन के संपादन में प्रकाश…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited “बचपन की वे छवियां मुझे जीवन के जादू की ओर खींचती हैं” in the group
Communication Studies on Humanities Commons 2 years, 9 months agoहिंदी कथाकार राजकुमार राकेश और प्रमोद रंजन की यह लंबी बातचीत शिमला में जनवरी, 2003 में हुई थी, जिसे वर्ष 2007 में पटना के मंडल विचार प्रकाशन ने एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया था। इस बातचीत में जादूई यथार्थवाद, मार्क्सवाद, दलित विमर्श तथा लेखक और सत्ता के बीच संबंध जैसे मुद्दे प्रमुखता से आए हैं।
पटना से जाबिर हुसेन के संपादन में प्रकाश…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited भला क्यों बची रहनी चाहिए किताबें? in the group
Public Humanities on Humanities Commons 2 years, 9 months agoपुस्तकों के अस्तित्व पर केंद्रित प्रमोद रंजन की यह टिप्प्णी पटना से प्रकाशित दैनिक प्रभात खबर में 12 दिसंबर, 2006 को प्रकाशित हुई थी। टिप्पणी से पता लगता है कि उस समय पटना में पुस्तक मेल लगा हुआ था और उसके उपलक्ष्य में प्रभात खबर विशेष पृष्ठ प्रकाशित कर रहा था, जिसमें यह टिप्प्णी प्रकाशित हुई थी।
इस टिप्पणी में कहा गया है किएक माध्यम…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited भला क्यों बची रहनी चाहिए किताबें? in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 2 years, 9 months agoपुस्तकों के अस्तित्व पर केंद्रित प्रमोद रंजन की यह टिप्प्णी पटना से प्रकाशित दैनिक प्रभात खबर में 12 दिसंबर, 2006 को प्रकाशित हुई थी। टिप्पणी से पता लगता है कि उस समय पटना में पुस्तक मेल लगा हुआ था और उसके उपलक्ष्य में प्रभात खबर विशेष पृष्ठ प्रकाशित कर रहा था, जिसमें यह टिप्प्णी प्रकाशित हुई थी।
इस टिप्पणी में कहा गया है किएक माध्यम…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited भला क्यों बची रहनी चाहिए किताबें? in the group
Digital Books on Humanities Commons 2 years, 9 months agoपुस्तकों के अस्तित्व पर केंद्रित प्रमोद रंजन की यह टिप्प्णी पटना से प्रकाशित दैनिक प्रभात खबर में 12 दिसंबर, 2006 को प्रकाशित हुई थी। टिप्पणी से पता लगता है कि उस समय पटना में पुस्तक मेल लगा हुआ था और उसके उपलक्ष्य में प्रभात खबर विशेष पृष्ठ प्रकाशित कर रहा था, जिसमें यह टिप्प्णी प्रकाशित हुई थी।
इस टिप्पणी में कहा गया है किएक माध्यम…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited किन्नौर में बहु-पति प्रथा : ‘मैं अपने दोनों बेटों को कहता हूं कि वे एक ही लड़की से विवाह करें’ in the group
Public Humanities on Humanities Commons 2 years, 9 months agoखूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण किन्नौर का समाज व संस्कृति शेष भारत से अलग है। यह बौद्ध धर्म का इलाका है, जिसे हिंदूवादी संस्कृति लीलती जा रही है। आर्थिक संपन्नता के आगमन से जाति-आधारित उत्पीड़न और भेदभाव कम हो रहा है। प्रमोद रंजन ने इस यात्रा संस्मरण में किन्नौर की विशिष्ट संस्कृति, बहु पत्नी प्रथा, वहां के समाज और राजनीति…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited किन्नौर में बहु-पति प्रथा : ‘मैं अपने दोनों बेटों को कहता हूं कि वे एक ही लड़की से विवाह करें’ in the group
Place Studies on Humanities Commons 2 years, 9 months agoखूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण किन्नौर का समाज व संस्कृति शेष भारत से अलग है। यह बौद्ध धर्म का इलाका है, जिसे हिंदूवादी संस्कृति लीलती जा रही है। आर्थिक संपन्नता के आगमन से जाति-आधारित उत्पीड़न और भेदभाव कम हो रहा है। प्रमोद रंजन ने इस यात्रा संस्मरण में किन्नौर की विशिष्ट संस्कृति, बहु पत्नी प्रथा, वहां के समाज और राजनीति…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited किन्नौर में बहु-पति प्रथा : ‘मैं अपने दोनों बेटों को कहता हूं कि वे एक ही लड़की से विवाह करें’ in the group
Gender Studies on Humanities Commons 2 years, 9 months agoखूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण किन्नौर का समाज व संस्कृति शेष भारत से अलग है। यह बौद्ध धर्म का इलाका है, जिसे हिंदूवादी संस्कृति लीलती जा रही है। आर्थिक संपन्नता के आगमन से जाति-आधारित उत्पीड़न और भेदभाव कम हो रहा है। प्रमोद रंजन ने इस यात्रा संस्मरण में किन्नौर की विशिष्ट संस्कृति, बहु पत्नी प्रथा, वहां के समाज और राजनीति…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited किन्नौर में बहु-पति प्रथा : ‘मैं अपने दोनों बेटों को कहता हूं कि वे एक ही लड़की से विवाह करें’ in the group
Cultural Studies on Humanities Commons 2 years, 9 months agoखूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण किन्नौर का समाज व संस्कृति शेष भारत से अलग है। यह बौद्ध धर्म का इलाका है, जिसे हिंदूवादी संस्कृति लीलती जा रही है। आर्थिक संपन्नता के आगमन से जाति-आधारित उत्पीड़न और भेदभाव कम हो रहा है। प्रमोद रंजन ने इस यात्रा संस्मरण में किन्नौर की विशिष्ट संस्कृति, बहु पत्नी प्रथा, वहां के समाज और राजनीति…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited किन्नौर में बहु-पति प्रथा : ‘मैं अपने दोनों बेटों को कहता हूं कि वे एक ही लड़की से विवाह करें’ in the group
Buddhist Studies on Humanities Commons 2 years, 9 months agoखूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण किन्नौर का समाज व संस्कृति शेष भारत से अलग है। यह बौद्ध धर्म का इलाका है, जिसे हिंदूवादी संस्कृति लीलती जा रही है। आर्थिक संपन्नता के आगमन से जाति-आधारित उत्पीड़न और भेदभाव कम हो रहा है। प्रमोद रंजन ने इस यात्रा संस्मरण में किन्नौर की विशिष्ट संस्कृति, बहु पत्नी प्रथा, वहां के समाज और राजनीति…[Read more]
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फरवरी, 2010 में प्रकाशित इस लेख में बिहार की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को रेखांकित किया गया है, जिसके कारण वंचित तबकों से आने लोगों का उत्पीड़न हो रहा था। लेख में इसके लिए तत्कालीन नीतीश कुमार की सरकार को दोषी बाताया गया है।
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Pramod Ranjan deposited “बचपन की वे छवियां मुझे जीवन के जादू की ओर खींचती हैं” on Humanities Commons 2 years, 9 months ago
हिंदी कथाकार राजकुमार राकेश और प्रमोद रंजन की यह लंबी बातचीत शिमला में जनवरी, 2003 में हुई थी, जिसे वर्ष 2007 में पटना के मंडल विचार प्रकाशन ने एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया था। इस बातचीत में जादूई यथार्थवाद, मार्क्सवाद, दलित विमर्श तथा लेखक और सत्ता के बीच संबंध जैसे मुद्दे प्रमुखता से आए हैं।
पटना से जाबिर हुसेन के संपादन में प्रकाश…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited भला क्यों बची रहनी चाहिए किताबें? on Humanities Commons 2 years, 9 months ago
पुस्तकों के अस्तित्व पर केंद्रित प्रमोद रंजन की यह टिप्प्णी पटना से प्रकाशित दैनिक प्रभात खबर में 12 दिसंबर, 2006 को प्रकाशित हुई थी। टिप्पणी से पता लगता है कि उस समय पटना में पुस्तक मेल लगा हुआ था और उसके उपलक्ष्य में प्रभात खबर विशेष पृष्ठ प्रकाशित कर रहा था, जिसमें यह टिप्प्णी प्रकाशित हुई थी।
इस टिप्पणी में कहा गया है किएक माध्यम…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited किन्नौर में बहु-पति प्रथा : ‘मैं अपने दोनों बेटों को कहता हूं कि वे एक ही लड़की से विवाह करें’ on Humanities Commons 2 years, 9 months ago
खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण किन्नौर का समाज व संस्कृति शेष भारत से अलग है। यह बौद्ध धर्म का इलाका है, जिसे हिंदूवादी संस्कृति लीलती जा रही है। आर्थिक संपन्नता के आगमन से जाति-आधारित उत्पीड़न और भेदभाव कम हो रहा है। प्रमोद रंजन ने इस यात्रा संस्मरण में किन्नौर की विशिष्ट संस्कृति, बहु पत्नी प्रथा, वहां के समाज और राजनीति…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? in the group
Sociology on Humanities Commons 2 years, 9 months agoयह आलेख आम आदमी पार्टी की दिल्ली में पहली बार सरकार बनने के बाद लिखा गया था। आलेख में आम आदमी पार्टी की सामाजिक न्याय की अवधारणा पर विचार किया गया है। यह लेख बताता है कि पार्टी दलित, पिछड़ों के हितों की परवाह नहीं करती।
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Pramod Ranjan deposited पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? in the group
Public Humanities on Humanities Commons 2 years, 9 months agoयह आलेख आम आदमी पार्टी की दिल्ली में पहली बार सरकार बनने के बाद लिखा गया था। आलेख में आम आदमी पार्टी की सामाजिक न्याय की अवधारणा पर विचार किया गया है। यह लेख बताता है कि पार्टी दलित, पिछड़ों के हितों की परवाह नहीं करती।
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Pramod Ranjan deposited पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? in the group
Political Philosophy & Theory on Humanities Commons 2 years, 9 months agoयह आलेख आम आदमी पार्टी की दिल्ली में पहली बार सरकार बनने के बाद लिखा गया था। आलेख में आम आदमी पार्टी की सामाजिक न्याय की अवधारणा पर विचार किया गया है। यह लेख बताता है कि पार्टी दलित, पिछड़ों के हितों की परवाह नहीं करती।
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Pramod Ranjan deposited सामाजिक न्याय की अवधारणा पर खतरे in the group
Sociology on Humanities Commons 2 years, 9 months agoसमाजिक न्याय की अवधारणा क्या है? भारत में सामाजिक न्याय का संघर्ष मुख्य रूप से द्विजों और शूद्रों-अतिशूद्रों-आदिवासियों के बीच है। द्विज अल्पसंख्यक हैं जबकि शुद्र-अतिशूद्र-आदिवासी बहुसंख्यक। देश के लोकतंत्र पर राज करने वाली दोनों प्रमुख पार्टियां – कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी – अपने संगठन में ओबीसी प्रकोष्ठ, दलित प्रकोष्ठ, आदिवासी प्रकोष्ठ…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited Bihar’s Most Backward castes in the line of fireBihar’s Most Backward castes in the line of fire in the group
Public Humanities on Humanities Commons 2 years, 9 months agoOn April 14, 2011, a socially dominant community burnt down houses belonging to Dalit and Most Backward communities in Harchanda village of Darbhanga district, Bihar. Various aspects of the incident have been recorded in this news analysis.
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