A group devoted do discuss and analyse works of Literary Journalism from all around the globe. Our notion of Literary Journalism is that of works that are simultaneously literatury and journalistic in their essence, i.e. nonfiction prose works with a narrative aesthetic.
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Pramod Ranjan deposited विपाशा का कविता अंक: हिमाचल के साहित्यिक इतिहास की झलक in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 2 years, 5 months agoहिमाचल प्रदेश के भाषा एवं संस्कृति विभाग की पत्रिका विपाशा का अप्रैल – अगस्त 2022 अंक हिमाचल की हिंदी कविता पर केंद्रित था। यह उस अंक की प्रमोद रंजन द्वारा लिखित समीक्षा है।
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Pramod Ranjan deposited मणिपुर हिंसा: परतों के भीतर कितनी परतें होती हैं? in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 2 years, 7 months agoयह मणिपुर में 2023 में हुई हिंसा पर केंद्रित प्रमोद रंजन के रिपोर्ताजों का पहला भाग है।
प्रमोद रंजन इसमें पूर्वोत्तर भारत के इतिहास, संस्कृति और समाज में आ रहे परिवर्तनों को चिन्हित किया है तथा उसका संवेदनशील, मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक चित्र प्रस्तुत किया है।
उन्होंने इस रिपोर्ताज में यह भी बताया है कि हिंसा के दौरान मैतेई महिलाओं के…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited “बचपन की वे छवियां मुझे जीवन के जादू की ओर खींचती हैं” in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 2 years, 11 months agoहिंदी कथाकार राजकुमार राकेश और प्रमोद रंजन की यह लंबी बातचीत शिमला में जनवरी, 2003 में हुई थी, जिसे वर्ष 2007 में पटना के मंडल विचार प्रकाशन ने एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया था। इस बातचीत में जादूई यथार्थवाद, मार्क्सवाद, दलित विमर्श तथा लेखक और सत्ता के बीच संबंध जैसे मुद्दे प्रमुखता से आए हैं।
पटना से जाबिर हुसेन के संपादन में प्रकाश…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited भला क्यों बची रहनी चाहिए किताबें? in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 2 years, 11 months agoपुस्तकों के अस्तित्व पर केंद्रित प्रमोद रंजन की यह टिप्प्णी पटना से प्रकाशित दैनिक प्रभात खबर में 12 दिसंबर, 2006 को प्रकाशित हुई थी। टिप्पणी से पता लगता है कि उस समय पटना में पुस्तक मेल लगा हुआ था और उसके उपलक्ष्य में प्रभात खबर विशेष पृष्ठ प्रकाशित कर रहा था, जिसमें यह टिप्प्णी प्रकाशित हुई थी।
इस टिप्पणी में कहा गया है किएक माध्यम…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited बहुजन साहित्य और आलोचना in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoयह फारवर्ड प्रेस की बहुजन साहित्य वार्षिकी: 2013 का संपादकीय है। इसमें बहुजन साहित्य और बहुजन आलोचना की अवधारणा पर संक्षेप में बात की गई है।
आलेख में कहा गया है कि बहुजन साहित्य का विकास वस्तुत: बहुजन आलोचना का विकास है। जैसे-जैसे हम बहुजन साहित्य को चिन्हित करते जाएंगे, अभिजन साहित्य स्वत: ही हाशिए का साहित्य बनता जाएगा क्योंकि हिंदी साहित…[Read more] -
Pramod Ranjan deposited नया ज्ञानोदय: ताअजीम के मेआंर परखने होंगे in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoवर्ष 2007 में हिंदी की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘नया ज्ञानाेदय’ में प्रकाशित आलोचक विजय कुमार के एक लेख पर विवाद हुआ था। इस लेख में उन्होंने नए कवियों को आड़े हाथों लिया था।
विजय कुमार के इस लेख के विरोध में युवा कवियों ने एक पुस्तिका भी प्रकाशित थी। पटना की संस्था ‘लोक दायरा’ द्वारा प्रकाशित इस पुस्तिका का शीर्षक था- “युवा विरोध…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited हरियाणा का दलित आंदोलन और वेदपाल तंवर in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month ago21 अप्रैल 2010 की रात को हरियाणा के हिसार जिला के मिर्चपुर में दबंग जाट समुदाय ने दलितों की बस्ती में लगा दी थी। इस अग्निकांड में 70 साल के बुर्जुग और उनकी अपंग बेटी जिंदा जला दिया गया था। उसके बाद मिर्चपुर के दलितों को गांव छोड़कर भागना पड़ा था।
अध्येता प्रमोद रंजन ने जुलाई, 2012 में मिर्चपुर का दौरा किया। वे जिला मुख्यालय हिसार में मिर…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited Bahujan Criticism: From a Distinct Angle in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoBahujan criticism underlines the presence of not only literature of the Dalit, Adivasi, and OBC sections but also Brahmanical and other dwija (upper caste) literature; and it also brings out aspects of their fundamental (social) make-up and their consequences. It interprets entrenched values and aesthetics in various kinds of literature. Thus,…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited बहुजन आलोचना: हिंदी समाज का साहित्य इस कोण से in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoबहुजन आलोचना न सिर्फ़ दलित, आदिवासी व पिछड़ा वर्ग के साहित्य बल्कि ब्राह्मणवादी साहित्य और अन्य द्विज साहित्य की मौजूदगी को भी चिन्हित करती है और उनकी बुनावट के मूल (सामाजिक) पहलुओं और उसके परिणामों को सामने लाती है। विविध प्रकार के साहित्य में विन्यस्त मूल्यों और सौंदर्यबोध की मीमांसा करती है। इस प्रकार यह कई प्रकार के आवरणों, छद॒म…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited सोशल मीडिया, बिहार की सत्ता और निलंबन in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month ago16 सितबर, 2011 को बिहार विधान परिषद् ने अपने दो कर्मचारियों- अरुण नारायण और मुसाफिर बैठा निलंबित कर दिया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने परिषद् सभापति के निर्णय पर अपने एक फेसबुक पोस्ट में सवाल उठाया था। इससे पहले परिषद् ने अपने एक और कर्मचारी सैयद जावेद हुसेन को भी नौकरी से बर्खास्त कर दिया था।
यह टिप्प्णी इसी संदर्भ में है। -
Pramod Ranjan deposited टिप्पणियों के खिलाफ एक लंबी टिप्पणी in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoयह एक संस्मरणात्मक ललित निबंध है। इसमें बिहार के कथाकार व राजनेता जाबिर हुसेन, रामधारी सिंह दिवाकर और प्रमोद रंजन के बीच साहित्यिक रचना की स्वायत्तता को लेकर हुए विमर्श का प्रसंग है। लेखक का तर्क है किसी साहित्यिक रचना में उसकी पृष्ठभूमि के उल्लेख से उसकी स्वायत्तता भंग होती है और वह रचना के पूर्ण आस्वाद में बाधक होती है।
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Pramod Ranjan deposited यवन की परी (जन विकल्प कविता पुस्तिका) in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoयह कविता पुस्तिका पटना से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘जन विकल्प’ के प्रवेशांक (जनवरी, 2007) के साथ नि:शुल्क वितरित की गई थी।
जन विकल्प का प्रकाशन पटना से जनवरी, 2007 से दिसंबर, 2007 तक हुआ।पत्रिका के संपादक प्रेमकुमार और प्रमोद रंजन थे।उपरोक्त इस कविता-पुस्तिका की भूमिका रति सक्सेना लिखी है, जो निम्नांकित है : “पेरिया परसिया, सेता…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited “बचपन की वे छवियां मुझे जीवन के जादू की ओर खींचती हैं” in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoहिंदी कथाकार राजकुमार राकेश और प्रमोद रंजन की यह लंबी बातचीत शिमला में जनवरी, 2003 में हुई थी, जिसे पटना से जाबिर हुसेन के संपादन में प्रकाशित पत्रिका दोआबा ने जून, 2007 अंक में प्रकाशित किया था। उसी वर्ष इसे इसे पटना के मंडल विचार प्रकाशन ने एक पुस्तिका के रूप में भी प्रकाशित किया था। इस बातचीत में जादूई यथार्थवाद, मार्क्सवाद, दलित व…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited मीडिया: भाषा का सवाल (ग्राम परिवेश का पत्रकारिता विशेषांक-3) in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoइक्कसवीं सदी के पहले दशक के पूर्वाध में हिमाचल प्रदेश की साहित्यिक पत्रकारिता को प्रमोद रंजन ने एक नई दिशा दी थी। उन्होंने इस दौरान शिमला से प्रकाशित सांध्य दैनिक “भारतेंदु शिखर” और साप्ताहिक “ग्राम परिवेश” संपादन किया। उन्होंने इन समाचार पत्रों में साहित्यिक और विभिन्न वैचारिक मुद्दों पर केंद्रित विभिन्न परिशिष्टों और विशेषांकों का प्रकाशन कि…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited समय से संवाद आवश्यक in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoप्रेमकुमार मणि की यह संपादकीय टिप्पणी पटना से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘जन विकल्प’ की साहित्य वार्षिकी, 2008 में प्रकाशित हुई थी। यह टिप्पणी ‘समय से संवाद’ पुस्तक में भी संकलित है।
जन विकल्प के संपादक प्रेमकुमार मणि और प्रमोद रंजन थे। -
Pramod Ranjan deposited सियासत और साहित्य का दोआबा in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoयह हिंदी-उर्दू लेखक और राजनेता जाबिर हुसेन का संक्षिप्त परिचय है, जो इंडिया टुडे में प्रकाशित हुआ था।
बाद में इसे सुबूही हुसेन द्वारा संपादित पुस्तक ‘रेत पर लिखी इबारतें: जाबिर हुसेन का रचना-कर्म’ पुस्तक में भी संकलित किया गया। -
Pramod Ranjan deposited बाढ़: अनकही कहानी in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoइस पुस्तिका में बिहार की कोसी नदी में वर्ष 2008 में आई प्रलयंकारी बाढ़ का आंखों देखा वर्णन है। बाढ़ में हजारों लोग मारे गए थे, लेकिन बिहार में सत्ता पर काबिज पार्टी ने इस त्रासदी काे एक जाति विशेष को सबक सिखाने के अवसर के रूप में लिया था। इसका तथ्यात्मक ब्यौरा इसमें है। साथ ही इसमें बेघर हुए लोगों की मर्मांतक पीड़ा का भी चित्रण है।…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited समय से संवाद: जन विकल्प संचयिता in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months ago‘समय से संवाद: जनविकल्प संचयिता’ नाम यह पुस्तक हिंदी मासिक ‘जन विकल्प’ में प्रकाशित प्रतिनिधि सामग्री का संकलन है। प्रेमकुमार मणि और प्रमोद रंजन के संपादन में पटना से वर्ष 2007 में प्रकाशित इस पत्रिका की जनपक्षधरता, निष्पक्षता और मौलिक त्वरा ने समाजकर्मियों और बुद्धिजीवियों को गहराई से आलोड़ित किया था। इस पुस्तक में जिन लेखों और साक्षात्कारों…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited हिंदी कविता में संताल परगना का चेहरा in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoयह लेख संथाली मूल की आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल की कविताओं पर केंद्रित है।
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Pramod Ranjan deposited हिमाचल का साहित्यिक परिदृश्य: शिमला डायरी in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoशिमला डायरी हिंदी पत्रकार और लेखक प्रमोद रंजन के संस्मरणों की पुस्तक है, जिसका केंद्रबिंदु साहित्यिक गतिविधियां हैं। यह पुस्तक 21वीं सदी की शुरुआत में पत्रकारिता के नैतिक पतन की कहानी भी कहती है। हिमाचल प्रदेश पर केंद्रित इस पुस्तक में तत्कालीन राजनीति की भी झलक है।
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