A group devoted do discuss and analyse works of Literary Journalism from all around the globe. Our notion of Literary Journalism is that of works that are simultaneously literatury and journalistic in their essence, i.e. nonfiction prose works with a narrative aesthetic.
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Pramod Ranjan deposited जन विकल्प का प्रकाशन: वह दुनिया और आज का दौर [Publication of Jan Vikalp: That world and today’s era] in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoमासिक पत्रिका जन विकल्प 2007 में पटना से प्रकाशित हुई थी। इसके संपादक प्रेमकुमार मणि और प्रमोद रंजन थे। पत्रिका के केवल 11 अंक प्रकाशित हुए थे। उस समय इस पत्रिका की जनपक्षधरता, वस्तुनिष्ठता और मौलिक उत्साह ने समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों को खूब आंदोलित किया था।
जन विकल्प में प्रकाशित प्रतिनिधि सामग्री को ‘समय से संवाद: जन विकल्प संचयिता’ ना…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited ‘कला और साहित्य के केंद्र में जीवन होना चाहिए’ (प्रेमकुमार मणि से प्रमेाद रंजन की बातचीत) in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoहिंदी साहित्यकार व चिंतक प्रेमकुमार मणि अपनी उत्कृष्ट कहानियों और वैचारिक लेखों के लिए जाने जाते हैं। उनके पांच कहानी-संकलन, एक उपन्यास और लेखों के कई संकलन प्रकाशित हैं। ‘अकथ कहानी’ शीर्षक से उनकी आत्मकथा शीघ्र प्रकाश्य है। इस बातचीत में प्रेमकुमार मणि के जीवन के कई पहलु पहली बार पाठकों के सामने आए हैं।
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Pramod Ranjan deposited ‘हिंदी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावन’ व ‘महिषासुर एक जननायक’: नई सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि की प्रस्तावना in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoबहुजन साहित्य और संस्कृति की अवधारणा ने पिछले कुछ वर्षों में आकार लेना शुरू किया है। अभी हाल (2016) में आए प्रमोद रंजन द्वारा संपादित तीन संकलन- ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘हिन्दी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’और ‘महिषासुर एक जननायक’- बहुजन साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन की प्रस्तावना और अवधारणा को सामने रखते हैं और इसे पल्लवित-पुष्पित तथा विकसित क…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited ‘दोआबा’ का अहिल्या आख्यान और साहित्य की कसौटी in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoपटना से प्रकाशित दोआबा के जनवरी-मार्च, 2022 अंक की समीक्षा है। दोआबा का यह अंक लगभग 600 पन्नों का है। इनमें से 533 पन्नों में नीलम नील की दो ‘कथा-डायरी’ प्रकाशित हैं, जिनके शीर्षक क्रमश: ‘आंगन में आग’ और ‘अहिल्या आख्यान’ हैं। शेष पृष्ठों पर उन्हीं पर केंद्रित संपादकीय, संस्मरण आदि हैं। साहित्य की पहचान यह नहीं है कि लेखक कितना संवेदनशील ह…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited हिंदी की साहित्यिक-वैचारिक पत्रिकाएं: आंधी-तूफान में बजती डुगडुगी in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoइंडिया टुडे के 24 जून 2015 अंक में प्रकाशित इस रिपोर्ट में हिंदी की प्रमुख साहित्यिक वैचारिक पत्रिकाओं के संघर्ष को बताया गया है।
रिपोर्ट में प्रकाशित पत्रिकाओं के संपादकों के वक्तव्य:
“हंस वंचितों की पत्रिका है और धार्मिक विचारों का समर्थन नहीं करती है। हम राजेंद्र जी के विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं”- संजय सहाय,…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited लेखकीय संघर्ष में कोई बाइपास नहीं होता in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoशिमला और हिमाचल से प्रमोद रंजन का गहरा नाता रहा है। वे अपनी युवावस्था के दिनों में यहाँ जीविका की तलाश में आए थे। पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा वर्ष 2003 से 2006 के बीच हिमाचल-प्रवास के दौरान लिखी गई उनकी निजी डायरी है। जैसा कि रंजन स्वयं मानते हैं कि यह उनकी मनःस्थितियों का ‘विरेचन’ भी है और साथ ही साथ ‘तात्कालिक मनोभावों, घटनाओं व परिवेशगत…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited शिमला डायरी: पीछे छूट गई धूल को समेट लाया कौन खानाबदोश in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoशिमला डायरी’ अपने समय और समाज की एक ऐसी साहित्यिक-सांस्कृतिक डायरी और दस्तावेज है, जिसका एक अहम हिस्सा हिंदी पत्रकारिता की दुनिया है। इसका विहंगम अवलोकन किया है चर्चित कवि और पत्रकार प्रमोद कौंसवाल ने, जिन्होंने काफी समय तक चंडीगढ़ में रहते हुए खुद शिमला, चंडीगढ़ और पंजाब की पत्रकारिता की दुनिया को बहुत करीब से देखा है। यह किताब की सिर्फ ए…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited कदम सोच के रखें: दूरास्त् पर्वतानि रम्यते in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoप्रमोद रंजन की चर्चित पुस्तक “शिमला डायरी” एक सुन्दर साज-सज्जा वाली पुस्तक है। सौम्य परिवेश की पृष्टभूमि, हरियाली, फूलों और किन्हीं ऐतिहासिक इमारतों, जन-जीवन के खुलते पन्नों की एक सुन्दर किताब के साथ तीन उपशीर्षकों ‘आलोचना, ‘कहानी-कविताएं’ व ‘मौखिक इतिहास’ के ऊपर “शिमला डायरी” पहली नज़र में ही पाठकों को आकर्षित करती है।
यह डायरी न केवल अ…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited Shimla Diary: A gypsy’s account of the times gone by in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoShimla Diary is a literary-cultural chronicle and a documentation of its times and society, with a keen focus on the world of Hindi journalism. Well-known poet and journalist Pramod Kaunswal, who has seen Hindi journalism in Shimla, Chandigarh and Punjab at close quarters, pens his impressions of the book. This is not just a book review but a…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited बहुजन साहित्य प्रगतिशील और दलित साहित्य का विस्तार है: प्रमोद रंजन in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months ago-आज समाचार सेवा, पटना-
*बहुजन साहित्य प्रगतिशील और दलित साहित्य का विस्तार है*
*प्रमोद रंजन से बातचीत*प्रश्न: आपने बहुजन साहित्य की अवधारणा पर भी काम किया है। इस अवधारणा के बारे में कुछ बताएं।
प्रमोद रंजन: बहुजन साहित्य का अर्थ है– अभिजन के विपरीत बहुजन का साहित्य और उनकी वैचारिकी। प्रगतिशील- मार्क्सवादी विचारधारा में जो ‘जन’ है, ‘ब…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited विपाशा के कविता विशेषांक से गुजरते हुए in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoयह हिमाचल प्रदेश के भाषा एवं संस्कृति विभाग की पत्रिका ‘विपाशा’ के वृहत्त कविता विशेषांक की समीक्षा है, जिसमें सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय, केदारनाथ सिंह, विजेंद्र, पवन करण, प्रदीप सैनी, लीलाधर जगुड़ी, नरेश सक्सेना, मंगलेश डबराल, पंकज सिंह, अनूप सेठी, कुलराजीव पंत आदि की कविताओं को रेखांकित किया गया है।
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Pramod Ranjan deposited बहुजन साहित्य: वर्तमान और भविष्य [Bahujan Literature: Present and Future] in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoयह आलेख भारतीय साहित्य में उभर रही बहुजन अवधारणा को रेखांकित करता है।
इस लेख में बताया गया है कि “बहुजन साहित्य का अर्थ है– अभिजन के विपरीत बहुजन का साहित्य और उनकी वैचारिकी। प्रगतिशील- मार्क्सवादी विचारधारा में जो ‘जन’ है, ‘बहुजन’ उसकी अगली कड़ी भी है। मार्क्सवाद के ‘जन’ का अर्थ भारत के सामाजिक-यथार्थ के संदर्भ में न सिर्फ अस्पष्ट और अनिश्…[Read more] -
Pramod Ranjan deposited “साहित्य प्राय: उनका पक्ष लेता है जो हारे हुए हैं” : कवि अरुण कमल से प्रमोद रंजन की बातचीत in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 4 months agoहिंदी कवि अरूण कमल से प्रमेाद रंजन की यह बातचीत पटना से प्रकाशित जन विकल्प के प्रवेशांक (जनवरी, 2007) में प्रकाशित हुई थी। साक्षात्कार के लिए अरुण कमल को प्रश्न साैंप दिए गए थे, जिसका उन्होंने लिखित उत्तर दिया था।
इस साक्षात्कार में अरूण कमल ने जिन प्रश्नों के उत्तर दिए हैं, उनमें मुख्य निम्नांकित हैं :
1. आपको २०वीं सदी के एक महत्वपूर्ण क…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited दोआबा : जारी है बहस in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 4 months agoयह पटना से प्रकाशित ‘दोआबा’ पत्रिका के प्रवेशांक की समीक्षा है। दोआबा के संपादक जाबिर हुसेन साहित्यकार के अतिरिक्त राजनेता और समाजकर्मी भी रहे हैं। वे लगभग एक दशक तक बिहार विधान परिषद के सभापति रहे।
दोआबा के समीक्षित अंक में 100 से अधिक रचानकारों की रचानाएं प्रकाशित हुईं थीं, जिनमें कंवल भारती, मधुकर सिंह,मनमोहन सरल, हृदयेश, प्रे…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited सच्ची रामायण और हिंदी का कुनबावाद in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 4 months agoवर्ष 2022 में मेरे द्वारा संपादित ईवी रामसामी पेरियार के लेखों और भाषणों का संकलन हिंदी में पुस्तकाकार प्रकाशित होने पर एक लेखक ने कुछ ऐसे मुद्दों को लेकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की थी, जिसका कोई आधार नहीं था। मैंने यह लेख उनके द्वारा इस संबंध में की गई टिप्पणी के उत्तर में लिखा गया था।
इस लेख में मैंने बताने की कोशिश की है कि हिंदी के प्र…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited हिंदी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 5 months agoइस लेख में बहुजन साहित्य की अवधारणा की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। बहुजन साहित्य की अवधारणा का पैमाना लेखक का कुल लेखकीय-वैचारिक अवदान है। इसलिए द्विज समुदाय से आने वाले ऐसे लेखकों के लिए भी इसमें स्थान है, जिनकी दृढ पक्षधरता इन वंचित तबकों के प्रति हो। जैसा कि हम फारवर्ड प्रेस में कहते आए हैं कि यह अवधारण…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited पत्रकारिता और पुस्तक प्रकाशन में नैतिकता का सवाल एक पत्र in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 5 months agoयह पत्र नई दिल्ली से प्रकाशित फारवर्ड प्रेस नामक द्विभाषी पत्रिका और पुस्तक प्रकाशन संस्थान के मालिक को लिखा गया था। यह पत्रिका वर्ष 2011 से 2016 के बीच अपने तार्किक तेवर और दलित, आदिवासी व अन्य पिछड़े वर्गों की हिमायत करने के कारण चर्चित रही थी। पत्रिका ने अन्य अनेक कामों के साथ इस दौरान हिंदू मिथकों का दलित-बहुजन नजरिए से पुर्नपाठ प्रस…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited फारवर्ड प्रेस और बौद्धिक लोकतंत्र in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 6 months agoयह संपादकीय लेख नई दिल्ली से प्रकाशित फारवर्ड प्रेस के अंतिम प्रिंट अंक में प्रकाशित हुआ है। आलेख में न्यूज रूम के लोकतांत्रिक स्वरूप की आवश्यकता पर चर्चा है। साथ दलित-बहुजन पत्रकारिता के विभिन्न आयाम इसमें सामने आए हैं।
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Pramod Ranjan deposited मीडिया में हिस्सेदारी in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 6 months agoयह पुस्तक बिहार के मीडिया संस्थानों में कार्यरत पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। इसमें वर्ष 2009 में किया गया वह चर्चित सर्वेक्षण भी शामिल है, जिसमें पाया गया था कि बिहार की पत्रकारिता में फैसला लेने वाले पदों पर एक भी दलित, पिछड़ा, आदिवासी या स्त्री नहीं है।
पुस्तक में कुल छह लेख शामिल हैं। जिनका विवरण निम्नांकित हैं :
1. पिछली…[Read more] -
Pramod Ranjan deposited Bahujan Literature: Conception of a concept in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 6 months agoTheir words might have been different but both Ambedkar and Phule talked of the slavery of women and Shudras and Ati-shudras, their liberation and their unity. The concept of ‘Bahujan Literature’ was born to highlight the need to explore the socio-cultural foundation of the liberation and unity of Bahujans.
there is a broad unanimity among Hin…[Read more]
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