• Bahujan criticism underlines the presence of not only literature of the Dalit, Adivasi, and OBC sections but also Brahmanical and other dwija (upper caste) literature; and it also brings out aspects of their fundamental (social) make-up and their consequences. It interprets entrenched values and aesthetics in various kinds of literature. Thus,…[Read more]

  • बहुजन आलोचना न सिर्फ़ दलित, आदिवासी व पिछड़ा वर्ग के साहित्य बल्कि ब्राह्मणवादी साहित्य और अन्य द्विज साहित्य की मौजूदगी को भी चिन्हित करती है और उनकी बुनावट के मूल (सामाजिक) पहलुओं और उसके परिणामों को सामने लाती है। विविध प्रकार के साहित्य में विन्यस्त मूल्यों और सौंदर्यबोध की मीमांसा करती है। इस प्रकार यह कई प्रकार के आवरणों, छद॒म…[Read more]

  • The pandemic has been the most vivid agent of change that many of us have known. But it has not changed everything: plenty of the institutions, norms, and practices that sustain racial capitalism, settler colonialism, and cisheteropatriarchy have either weathered the storm of the crisis or been nourished by its effects. And yet enough has changed…[Read more]

  • यह एक संस्मरणात्मक ललित निबंध है। इसमें बिहार के कथाकार व राजनेता जाबिर हुसेन, रामधारी सिंह दिवाकर और प्रमोद रंजन के बीच साहित्यिक रचना की स्वायत्तता को लेकर हुए विमर्श का प्रसंग है। लेखक का तर्क है किसी साहित्यिक रचना में उसकी पृष्ठभूमि के उल्लेख से उसकी स्वायत्तता भंग होती है और वह रचना के पूर्ण आस्वाद में बाधक होती है।

  • यह कविता पुस्तिका पटना से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘जन विकल्प’ के प्रवेशांक (जनवरी, 2007) के साथ नि:शुल्क वितरित की गई थी।
    जन विकल्प का प्रकाशन पटना से जनवरी, 2007 से दिसंबर, 2007 तक हुआ।पत्रिका के संपादक प्रेमकुमार और प्रमोद रंजन थे।

    उपरोक्त इस कविता-पुस्तिका की भूमिका रति सक्सेना लिखी है, जो निम्नांकित है : “पेरिया परसिया, सेता…[Read more]

  • हिंदी कथाकार राजकुमार राकेश और प्रमोद रंजन की यह लंबी बातचीत शिमला में जनवरी, 2003 में हुई थी, जिसे पटना से जाबिर हुसेन के संपादन में प्रकाशित पत्रिका दोआबा ने जून, 2007 अंक में प्रकाशित किया था। उसी वर्ष इसे इसे पटना के मंडल विचार प्रकाशन ने एक पुस्तिका के रूप में भी प्रकाशित किया था। इस बातचीत में जादूई यथार्थवाद, मार्क्सवाद, दलित व…[Read more]

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Kimberly Wine

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