• This editorial has appeared in the last print issue of FORWARD Press, published from New Delhi. The article discusses the need for a democratic form of newsroom. Along with this, various dimensions of Dalit-Bahujan journalism have come to the fore.

    The Forward Press magazine was bilingual (Hindi and English). The article uploaded here is also…[Read more]

  • इक्कसवीं सदी के दूसरे दशक में भारत में महिषासुर आंदोलन द्विज संस्कृति के लिए चुनौती बनकर उभरा। इसके माध्यम से आदिवासियों, पिछड़ों और दलितों के एक बड़े हिस्से ने अपनी सांस्कृतिक दावेदारी पेश की।

    लेकिन यह आंदोलन क्या है, इसकी जड़ें समाज में कहां तक फैली हैं, बहुजनों की सांस्कृतिक परंपरा में इसका क्या स्थान है, मौजूदा लोक-जीवन में महिषासुर क…[Read more]

  • इक्कसवीं सदी के दूसरे दशक में भारत में महिषासुर आंदोलन द्विज संस्कृति के लिए चुनौती बनकर उभरा। इसके माध्यम से आदिवासियों, पिछड़ों और दलितों के एक बड़े हिस्से ने अपनी सांस्कृतिक दावेदारी पेश की।

    लेकिन यह आंदोलन क्या है, इसकी जड़ें समाज में कहां तक फैली हैं, बहुजनों की सांस्कृतिक परंपरा में इसका क्या स्थान है, मौजूदा लोक-जीवन में महिषासुर क…[Read more]

  • इक्कसवीं सदी के दूसरे दशक में भारत में महिषासुर आंदोलन द्विज संस्कृति के लिए चुनौती बनकर उभरा। इसके माध्यम से आदिवासियों, पिछड़ों और दलितों के एक बड़े हिस्से ने अपनी सांस्कृतिक दावेदारी पेश की।

    लेकिन यह आंदोलन क्या है, इसकी जड़ें समाज में कहां तक फैली हैं, बहुजनों की सांस्कृतिक परंपरा में इसका क्या स्थान है, मौजूदा लोक-जीवन में महिषासुर क…[Read more]

  • इक्कसवीं सदी के दूसरे दशक में भारत में महिषासुर आंदोलन द्विज संस्कृति के लिए चुनौती बनकर उभरा। इसके माध्यम से आदिवासियों, पिछड़ों और दलितों के एक बड़े हिस्से ने अपनी सांस्कृतिक दावेदारी पेश की।

    लेकिन यह आंदोलन क्या है, इसकी जड़ें समाज में कहां तक फैली हैं, बहुजनों की सांस्कृतिक परंपरा में इसका क्या स्थान है, मौजूदा लोक-जीवन में महिषासुर क…[Read more]

  • इक्कसवीं सदी के दूसरे दशक में भारत में महिषासुर आंदोलन द्विज संस्कृति के लिए चुनौती बनकर उभरा। इसके माध्यम से आदिवासियों, पिछड़ों और दलितों के एक बड़े हिस्से ने अपनी सांस्कृतिक दावेदारी पेश की।

    लेकिन यह आंदोलन क्या है, इसकी जड़ें समाज में कहां तक फैली हैं, बहुजनों की सांस्कृतिक परंपरा में इसका क्या स्थान है, मौजूदा लोक-जीवन में महिषासुर क…[Read more]

  • इक्कसवीं सदी के दूसरे दशक में भारत में महिषासुर आंदोलन द्विज संस्कृति के लिए चुनौती बनकर उभरा। इसके माध्यम से आदिवासियों, पिछड़ों और दलितों के एक बड़े हिस्से ने अपनी सांस्कृतिक दावेदारी पेश की।

    लेकिन यह आंदोलन क्या है, इसकी जड़ें समाज में कहां तक फैली हैं, बहुजनों की सांस्कृतिक परंपरा में इसका क्या स्थान है, मौजूदा लोक-जीवन में महिषासुर क…[Read more]

  • महिषासुर आंदोलन के इस कदर अचानक फैल जाने का एक बड़ा कारण था कि बहुजन समाज में इन परंपराओं की जड़ें बहुत गहरी रही हैं और इनका प्रसार उसके अवचेतन तक रहा है। इन समुदायों से आने वाले फुले, आंबेडकर, पेरियार समेत सभी चिंतकों ने असुर-संस्कृति की न सिर्फ विस्तृत गवेषणा की है, बल्कि अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि यही उनकी वैचारिकी का प्रस्थान…[Read more]

  • महिषासुर आंदोलन के इस कदर अचानक फैल जाने का एक बड़ा कारण था कि बहुजन समाज में इन परंपराओं की जड़ें बहुत गहरी रही हैं और इनका प्रसार उसके अवचेतन तक रहा है। इन समुदायों से आने वाले फुले, आंबेडकर, पेरियार समेत सभी चिंतकों ने असुर-संस्कृति की न सिर्फ विस्तृत गवेषणा की है, बल्कि अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि यही उनकी वैचारिकी का प्रस्थान…[Read more]

  • महिषासुर आंदोलन के इस कदर अचानक फैल जाने का एक बड़ा कारण था कि बहुजन समाज में इन परंपराओं की जड़ें बहुत गहरी रही हैं और इनका प्रसार उसके अवचेतन तक रहा है। इन समुदायों से आने वाले फुले, आंबेडकर, पेरियार समेत सभी चिंतकों ने असुर-संस्कृति की न सिर्फ विस्तृत गवेषणा की है, बल्कि अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि यही उनकी वैचारिकी का प्रस्थान…[Read more]

  • महिषासुर आंदोलन के इस कदर अचानक फैल जाने का एक बड़ा कारण था कि बहुजन समाज में इन परंपराओं की जड़ें बहुत गहरी रही हैं और इनका प्रसार उसके अवचेतन तक रहा है। इन समुदायों से आने वाले फुले, आंबेडकर, पेरियार समेत सभी चिंतकों ने असुर-संस्कृति की न सिर्फ विस्तृत गवेषणा की है, बल्कि अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि यही उनकी वैचारिकी का प्रस्थान…[Read more]

  • महिषासुर आंदोलन के इस कदर अचानक फैल जाने का एक बड़ा कारण था कि बहुजन समाज में इन परंपराओं की जड़ें बहुत गहरी रही हैं और इनका प्रसार उसके अवचेतन तक रहा है। इन समुदायों से आने वाले फुले, आंबेडकर, पेरियार समेत सभी चिंतकों ने असुर-संस्कृति की न सिर्फ विस्तृत गवेषणा की है, बल्कि अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि यही उनकी वैचारिकी का प्रस्थान…[Read more]

  • महिषासुर आंदोलन के इस कदर अचानक फैल जाने का एक बड़ा कारण था कि बहुजन समाज में इन परंपराओं की जड़ें बहुत गहरी रही हैं और इनका प्रसार उसके अवचेतन तक रहा है। इन समुदायों से आने वाले फुले, आंबेडकर, पेरियार समेत सभी चिंतकों ने असुर-संस्कृति की न सिर्फ विस्तृत गवेषणा की है, बल्कि अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि यही उनकी वैचारिकी का प्रस्थान…[Read more]

  • यह “महिषासुर: एक जननायक” पुस्तक के दूसरे संस्करण में प्रकाशित भूमिका है। इस किताब का पहला संस्करण जून, 2016 में आया। यह अक्टूबर, 2016 में पुर्नमुद्रित हुई और नवंबर, 2017 में नए ISBN नंबर के साथ दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ। तब से अब तक यह पुस्तक कई बार पुनर्मुद्रित हो चुकी है। पहले संस्करण के कई लेख पहले पुनमुर्द्रण और दूसरे संस्करण में…[Read more]

  • On the night of April 21, 2010, the powerful Jat community at Mirchpur in Haryana’s Hisar district attacked a Dalit colony. A 70-year-old man and his handicapped daughter were burnt alive in this fire. After that, the Dalits of Mirchpur had to leave the village and run away.

    Scholar and journalist Pramod Ranjan visited Mirchpur in July 2012. He…[Read more]

  • On the night of April 21, 2010, the powerful Jat community at Mirchpur in Haryana’s Hisar district attacked a Dalit colony. A 70-year-old man and his handicapped daughter were burnt alive in this fire. After that, the Dalits of Mirchpur had to leave the village and run away.

    Scholar and journalist Pramod Ranjan visited Mirchpur in July 2012. He…[Read more]

  • On the night of April 21, 2010, the powerful Jat community at Mirchpur in Haryana’s Hisar district attacked a Dalit colony. A 70-year-old man and his handicapped daughter were burnt alive in this fire. After that, the Dalits of Mirchpur had to leave the village and run away.

    Scholar and journalist Pramod Ranjan visited Mirchpur in July 2012. He…[Read more]

  • 21 अप्रैल 2010 की रात को हरियाणा के हिसार जिला के मिर्चपुर में दबंग जाट समुदाय ने दलितों की बस्ती में लगा दी थी। इस अग्निकांड में 70 साल के बुर्जुग और उनकी अपंग बेटी जिंदा जला दिया गया था। उसके बाद मिर्चपुर के दलितों को गांव छोड़कर भागना पड़ा था।

    अध्येता प्रमोद रंजन ने जुलाई, 2012 में मिर्चपुर का दौरा किया। वे जिला मुख्यालय हिसार में मिर…[Read more]

  • 21 अप्रैल 2010 की रात को हरियाणा के हिसार जिला के मिर्चपुर में दबंग जाट समुदाय ने दलितों की बस्ती में लगा दी थी। इस अग्निकांड में 70 साल के बुर्जुग और उनकी अपंग बेटी जिंदा जला दिया गया था। उसके बाद मिर्चपुर के दलितों को गांव छोड़कर भागना पड़ा था।

    अध्येता प्रमोद रंजन ने जुलाई, 2012 में मिर्चपुर का दौरा किया। वे जिला मुख्यालय हिसार में मिर…[Read more]

  • 21 अप्रैल 2010 की रात को हरियाणा के हिसार जिला के मिर्चपुर में दबंग जाट समुदाय ने दलितों की बस्ती में लगा दी थी। इस अग्निकांड में 70 साल के बुर्जुग और उनकी अपंग बेटी जिंदा जला दिया गया था। उसके बाद मिर्चपुर के दलितों को गांव छोड़कर भागना पड़ा था।

    अध्येता प्रमोद रंजन ने जुलाई, 2012 में मिर्चपुर का दौरा किया। वे जिला मुख्यालय हिसार में मिर…[Read more]

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Pramod Ranjan

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