• Climate activist Disha Ravi was arrested by the police on 13 February 2021. The Government of India charged her with sedition.

    The 22-year-old Disha Ravi was charged with contributing to the ‘toolkit’ prepared by Swedish environmental activist Greta Thunberg for mobilizing support for the ongoing agitation of the landowners (farmers) of…[Read more]

  • Der Autor aus Indien beschreibt, in welcher Situation sich die Welt aufgrund der exzessiven und ungerechtfertigten Maßnahmen befindet, die ergriffen wurden, um die Verbreitung von Covid-19 aufzuhalten. Er zeigt, wie die Pandemie insbesondere die von sozialer Armut betroffenen Gemeinschaften beeinflusst. Er konzentriert sich auf die ausgebeuteten…[Read more]

  • Der Autor aus Indien beschreibt, in welcher Situation sich die Welt aufgrund der exzessiven und ungerechtfertigten Maßnahmen befindet, die ergriffen wurden, um die Verbreitung von Covid-19 aufzuhalten. Er zeigt, wie die Pandemie insbesondere die von sozialer Armut betroffenen Gemeinschaften beeinflusst. Er konzentriert sich auf die ausgebeuteten…[Read more]

  • [This article was first published in Hindi under the title “कोविड पश्चात दुनिया और बहुजन”. Ekta News and Features did the English translation of this article under the title “post covid world and Bahujan”. It was translated into German by Sabine Amann from the volunteer Rubikon translation team and edited by the volunteer Rubikon proofreading te…[Read more]

  • This editorial has appeared in the last print issue of Forward Press, published from New Delhi. The article discusses the need for a democratic form of the newsroom. Along with this, different dimensions of Dalit-Bahujan journalism have come to the fore.

  • This editorial has appeared in the last print issue of Forward Press, published from New Delhi. The article discusses the need for a democratic form of the newsroom. Along with this, different dimensions of Dalit-Bahujan journalism have come to the fore.

  • यह संपादकीय लेख नई दिल्ली से प्रकाशित फारवर्ड प्रेस के अंतिम प्रिंट अंक में प्रकाशित हुआ है। आलेख में न्यूज रूम के लोकतांत्रिक स्वरूप की आवश्यकता पर चर्चा है। साथ दलित-बहुजन पत्रकारिता के विभिन्न आयाम इसमें सामने आए हैं।

  • यह संपादकीय लेख नई दिल्ली से प्रकाशित फारवर्ड प्रेस के अंतिम प्रिंट अंक में प्रकाशित हुआ है। आलेख में न्यूज रूम के लोकतांत्रिक स्वरूप की आवश्यकता पर चर्चा है। साथ दलित-बहुजन पत्रकारिता के विभिन्न आयाम इसमें सामने आए हैं।

  • यह संपादकीय लेख नई दिल्ली से प्रकाशित फारवर्ड प्रेस के अंतिम प्रिंट अंक में प्रकाशित हुआ है। आलेख में न्यूज रूम के लोकतांत्रिक स्वरूप की आवश्यकता पर चर्चा है। साथ दलित-बहुजन पत्रकारिता के विभिन्न आयाम इसमें सामने आए हैं।

  • यह पुस्तक बिहार के मीडिया संस्थानों में कार्यरत पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। इसमें वर्ष 2009 में किया गया वह चर्चित सर्वेक्षण भी शामिल है, जिसमें पाया गया था कि बिहार की पत्रकारिता में फैसला लेने वाले पदों पर एक भी दलित, पिछड़ा, आदिवासी या स्त्री नहीं है।
    पुस्तक में कुल छह लेख शामिल हैं। जिनका विवरण निम्नांकित हैं :
    1. पिछली…[Read more]

  • यह पुस्तक बिहार के मीडिया संस्थानों में कार्यरत पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। इसमें वर्ष 2009 में किया गया वह चर्चित सर्वेक्षण भी शामिल है, जिसमें पाया गया था कि बिहार की पत्रकारिता में फैसला लेने वाले पदों पर एक भी दलित, पिछड़ा, आदिवासी या स्त्री नहीं है।
    पुस्तक में कुल छह लेख शामिल हैं। जिनका विवरण निम्नांकित हैं :
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  • यह पुस्तक बिहार के मीडिया संस्थानों में कार्यरत पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। इसमें वर्ष 2009 में किया गया वह चर्चित सर्वेक्षण भी शामिल है, जिसमें पाया गया था कि बिहार की पत्रकारिता में फैसला लेने वाले पदों पर एक भी दलित, पिछड़ा, आदिवासी या स्त्री नहीं है।
    पुस्तक में कुल छह लेख शामिल हैं। जिनका विवरण निम्नांकित हैं :
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  • यह पुस्तक बिहार के मीडिया संस्थानों में कार्यरत पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। इसमें वर्ष 2009 में किया गया वह चर्चित सर्वेक्षण भी शामिल है, जिसमें पाया गया था कि बिहार की पत्रकारिता में फैसला लेने वाले पदों पर एक भी दलित, पिछड़ा, आदिवासी या स्त्री नहीं है।
    पुस्तक में कुल छह लेख शामिल हैं। जिनका विवरण निम्नांकित हैं :
    1. पिछली…[Read more]

  • यह संपादकीय लेख नई दिल्ली से प्रकाशित फारवर्ड प्रेस के अंतिम प्रिंट अंक में प्रकाशित हुआ है। आलेख में न्यूज रूम के लोकतांत्रिक स्वरूप की आवश्यकता पर चर्चा है। साथ दलित-बहुजन पत्रकारिता के विभिन्न आयाम इसमें सामने आए हैं।

  • यह पुस्तक बिहार के मीडिया संस्थानों में कार्यरत पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। इसमें वर्ष 2009 में किया गया वह चर्चित सर्वेक्षण भी शामिल है, जिसमें पाया गया था कि बिहार की पत्रकारिता में फैसला लेने वाले पदों पर एक भी दलित, पिछड़ा, आदिवासी या स्त्री नहीं है।
    पुस्तक में कुल छह लेख शामिल हैं। जिनका विवरण निम्नांकित हैं :
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  • फरवरी, 2021 के अंतिम सप्ताह में भारतीय डिज़िटल दुनिया में यह ख़बर छायी रही कि सरकार सोशल-मीडिया कंपनियों पर लगाम कसने के लिए एक कड़ा नियमन लेकर आयी है। इसे “सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्‍थानों के लिए दिशा-निर्देश और डिज़िटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 “ का नाम दिया गया है। कहा गया कि जिन कंपनियों की नकेल कसने में यूरोपी…[Read more]

  • फरवरी, 2021 के अंतिम सप्ताह में भारतीय डिज़िटल दुनिया में यह ख़बर छायी रही कि सरकार सोशल-मीडिया कंपनियों पर लगाम कसने के लिए एक कड़ा नियमन लेकर आयी है। इसे “सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्‍थानों के लिए दिशा-निर्देश और डिज़िटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 “ का नाम दिया गया है। कहा गया कि जिन कंपनियों की नकेल कसने में यूरोपी…[Read more]

  • The case in which Laloo has been convicted is popularly known as the Fodder Scam. A brief recapitulation of the scam would be in order. The scam first began unfolding in Bihar in 1975-76, when the state was under Congress rule and Jagannath Mishra was the chief minister. The scam continued to flourish for the entire decade. The scam continued even…[Read more]

  • जिस मामले में लालू प्रसाद को सजा हुई है, वह चारा घोटाले के नाम से जाना जाता है। इस घोटाले की संक्षिप्त कथा जानना आवश्यक है। सन् 1974-75 की शुरुआत में ही जब इस घोटाले की शुरुआत हुई, तब बिहार में कांग्रेस का शासन था और डॉ. जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री हुआ करते थे। अबाध गति से पूरे दो दशक यह घोटाला चलता रहा। 1990 में जब लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बन…[Read more]

  • जिस मामले में लालू प्रसाद को सजा हुई है, वह चारा घोटाले के नाम से जाना जाता है। इस घोटाले की संक्षिप्त कथा जानना आवश्यक है। सन् 1974-75 की शुरुआत में ही जब इस घोटाले की शुरुआत हुई, तब बिहार में कांग्रेस का शासन था और डॉ. जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री हुआ करते थे। अबाध गति से पूरे दो दशक यह घोटाला चलता रहा। 1990 में जब लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बन…[Read more]

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Pramod Ranjan

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