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प्रमोद रंजन का ‘विश्वास का धंधा’ शीर्षक यह लेख हिंदी दैनिक जनसत्ता के 30 अगस्त, 2009 के अंक में प्रकाशित हुआ था। इस लेख के प्रकाशन के बाद हिंदी पत्रकारिता में जातिवाद के सवाल पर एक बड़ा विवाद हुआ था।
इससे संबंधित घटनाक्रम इस प्रकार था: प्रमोदरंजन का उपरोक्त लेख उनकी पुस्तिका ‘मीडिया में हिस्सेदारी’मेंसंकलित भी था औरउस पुस्तिका की भी ब…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited बजट 2021: मौत, अकाल की आहट और आर्थिक असमानता पर चुप्पी क्यों? in the group
Sociology on Humanities Commons 3 years, 1 month agoभारत में क्या हालत हो चुकी है, इसका अनुमान दिसंबर, 2020 में हुए एक सर्वेक्षण से लगता है। इस सर्वेक्षण के अनुसार भारत की आधी से अधिक आबादी को कोरोना-काल में पहले की तुलना में कम भोजन मिल रहा है। इनमें ज़्यादातर दलित और आदिवासी हैं।
लेकिन इन सूचनाओं से भी अधिक भयावह यह है कि भारत का बौद्धिक वर्ग, ग़रीबों के सर पर मँडराते मौत के इस साये से प्…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited बजट 2021: मौत, अकाल की आहट और आर्थिक असमानता पर चुप्पी क्यों? in the group
Political Philosophy & Theory on Humanities Commons 3 years, 1 month agoभारत में क्या हालत हो चुकी है, इसका अनुमान दिसंबर, 2020 में हुए एक सर्वेक्षण से लगता है। इस सर्वेक्षण के अनुसार भारत की आधी से अधिक आबादी को कोरोना-काल में पहले की तुलना में कम भोजन मिल रहा है। इनमें ज़्यादातर दलित और आदिवासी हैं।
लेकिन इन सूचनाओं से भी अधिक भयावह यह है कि भारत का बौद्धिक वर्ग, ग़रीबों के सर पर मँडराते मौत के इस साये से प्…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited बजट 2021: मौत, अकाल की आहट और आर्थिक असमानता पर चुप्पी क्यों? in the group
Medical Humanities on Humanities Commons 3 years, 1 month agoभारत में क्या हालत हो चुकी है, इसका अनुमान दिसंबर, 2020 में हुए एक सर्वेक्षण से लगता है। इस सर्वेक्षण के अनुसार भारत की आधी से अधिक आबादी को कोरोना-काल में पहले की तुलना में कम भोजन मिल रहा है। इनमें ज़्यादातर दलित और आदिवासी हैं।
लेकिन इन सूचनाओं से भी अधिक भयावह यह है कि भारत का बौद्धिक वर्ग, ग़रीबों के सर पर मँडराते मौत के इस साये से प्…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited बजट 2021: मौत, अकाल की आहट और आर्थिक असमानता पर चुप्पी क्यों? in the group
Indian Economy on Humanities Commons 3 years, 1 month agoभारत में क्या हालत हो चुकी है, इसका अनुमान दिसंबर, 2020 में हुए एक सर्वेक्षण से लगता है। इस सर्वेक्षण के अनुसार भारत की आधी से अधिक आबादी को कोरोना-काल में पहले की तुलना में कम भोजन मिल रहा है। इनमें ज़्यादातर दलित और आदिवासी हैं।
लेकिन इन सूचनाओं से भी अधिक भयावह यह है कि भारत का बौद्धिक वर्ग, ग़रीबों के सर पर मँडराते मौत के इस साये से प्…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited बजट 2021: मौत, अकाल की आहट और आर्थिक असमानता पर चुप्पी क्यों? on Humanities Commons 3 years, 1 month ago
भारत में क्या हालत हो चुकी है, इसका अनुमान दिसंबर, 2020 में हुए एक सर्वेक्षण से लगता है। इस सर्वेक्षण के अनुसार भारत की आधी से अधिक आबादी को कोरोना-काल में पहले की तुलना में कम भोजन मिल रहा है। इनमें ज़्यादातर दलित और आदिवासी हैं।
लेकिन इन सूचनाओं से भी अधिक भयावह यह है कि भारत का बौद्धिक वर्ग, ग़रीबों के सर पर मँडराते मौत के इस साये से प्…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited आजादी का अमृत महोत्सव और वंचित तबकों की जीवन-प्रत्याशा in the group
Sociology on Humanities Commons 3 years, 1 month agoयह अध्ययन बताता है कि भारत में ऊंची कही जाने वाले जातियों और अन्य पिछड़ी, दलित, आदिवासी जातियों की औसत उम्र में बहुत अंतर है।
सामान्यत: आदिवासी समुदाय से आने वाले लोग सबसे कम उम्र में मरते हैं, उसके बाद दलितों का नंबर आता है, फिर अन्य पिछड़ा वर्गों का। एक औसत सवर्ण हिंदू इन बहुजन समुदायों से बहुत अधिक वर्षों…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited आजादी का अमृत महोत्सव और वंचित तबकों की जीवन-प्रत्याशा in the group
Indian Economy on Humanities Commons 3 years, 1 month agoयह अध्ययन बताता है कि भारत में ऊंची कही जाने वाले जातियों और अन्य पिछड़ी, दलित, आदिवासी जातियों की औसत उम्र में बहुत अंतर है।
सामान्यत: आदिवासी समुदाय से आने वाले लोग सबसे कम उम्र में मरते हैं, उसके बाद दलितों का नंबर आता है, फिर अन्य पिछड़ा वर्गों का। एक औसत सवर्ण हिंदू इन बहुजन समुदायों से बहुत अधिक वर्षों…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited आजादी का अमृत महोत्सव और वंचित तबकों की जीवन-प्रत्याशा on Humanities Commons 3 years, 1 month ago
यह अध्ययन बताता है कि भारत में ऊंची कही जाने वाले जातियों और अन्य पिछड़ी, दलित, आदिवासी जातियों की औसत उम्र में बहुत अंतर है।
सामान्यत: आदिवासी समुदाय से आने वाले लोग सबसे कम उम्र में मरते हैं, उसके बाद दलितों का नंबर आता है, फिर अन्य पिछड़ा वर्गों का। एक औसत सवर्ण हिंदू इन बहुजन समुदायों से बहुत अधिक वर्षों…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited जन विकल्प का प्रकाशन: वह दुनिया और आज का दौर [Publication of Jan Vikalp: That world and today’s era] in the group
Literary theory on Humanities Commons 3 years, 1 month agoमासिक पत्रिका जन विकल्प 2007 में पटना से प्रकाशित हुई थी। इसके संपादक प्रेमकुमार मणि और प्रमोद रंजन थे। पत्रिका के केवल 11 अंक प्रकाशित हुए थे। उस समय इस पत्रिका की जनपक्षधरता, वस्तुनिष्ठता और मौलिक उत्साह ने समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों को खूब आंदोलित किया था।
जन विकल्प में प्रकाशित प्रतिनिधि सामग्री को ‘समय से संवाद: जन विकल्प संचयिता’ ना…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited जन विकल्प का प्रकाशन: वह दुनिया और आज का दौर [Publication of Jan Vikalp: That world and today’s era] in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month agoमासिक पत्रिका जन विकल्प 2007 में पटना से प्रकाशित हुई थी। इसके संपादक प्रेमकुमार मणि और प्रमोद रंजन थे। पत्रिका के केवल 11 अंक प्रकाशित हुए थे। उस समय इस पत्रिका की जनपक्षधरता, वस्तुनिष्ठता और मौलिक उत्साह ने समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों को खूब आंदोलित किया था।
जन विकल्प में प्रकाशित प्रतिनिधि सामग्री को ‘समय से संवाद: जन विकल्प संचयिता’ ना…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited जन विकल्प का प्रकाशन: वह दुनिया और आज का दौर [Publication of Jan Vikalp: That world and today’s era] on Humanities Commons 3 years, 1 month ago
मासिक पत्रिका जन विकल्प 2007 में पटना से प्रकाशित हुई थी। इसके संपादक प्रेमकुमार मणि और प्रमोद रंजन थे। पत्रिका के केवल 11 अंक प्रकाशित हुए थे। उस समय इस पत्रिका की जनपक्षधरता, वस्तुनिष्ठता और मौलिक उत्साह ने समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों को खूब आंदोलित किया था।
जन विकल्प में प्रकाशित प्रतिनिधि सामग्री को ‘समय से संवाद: जन विकल्प संचयिता’ ना…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited महज एक बच्चे की ताली पर (प्रभाष जोशी के लेख पर प्रतिक्रिया) in the group
Communication Studies on Humanities Commons 3 years, 2 months agoयह लेख प्रभाष जोशी के लेख ‘काले धंघे के रक्षक’ के प्रत्युत्तर में लिखा गया था, जो हाशिया नामक ब्लॉग पर सितंबर, 2009 में प्रकाशित हुआ था।
इससे संबंधित घटनाक्रम इस प्रकार था : प्रमोद रंजन रंजन का लेख ‘विश्वास का धंधा’ हिंदी दैनिक जनसत्ता के 30 अगस्त, 2009 अंक में संपादकीय पृष्ठ पर छपा था। प्रभाष जोशी जनसत्ता के संस्थापक-संपाद…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited महज एक बच्चे की ताली पर (प्रभाष जोशी के लेख पर प्रतिक्रिया) on Humanities Commons 3 years, 2 months ago
यह लेख प्रभाष जोशी के लेख ‘काले धंघे के रक्षक’ के प्रत्युत्तर में लिखा गया था, जो हाशिया नामक ब्लॉग पर सितंबर, 2009 में प्रकाशित हुआ था।
इससे संबंधित घटनाक्रम इस प्रकार था : प्रमोद रंजन रंजन का लेख ‘विश्वास का धंधा’ हिंदी दैनिक जनसत्ता के 30 अगस्त, 2009 अंक में संपादकीय पृष्ठ पर छपा था। प्रभाष जोशी जनसत्ता के संस्थापक-संपाद…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited ‘कला और साहित्य के केंद्र में जीवन होना चाहिए’ (प्रेमकुमार मणि से प्रमेाद रंजन की बातचीत) in the group
Literary theory on Humanities Commons 3 years, 2 months agoहिंदी साहित्यकार व चिंतक प्रेमकुमार मणि अपनी उत्कृष्ट कहानियों और वैचारिक लेखों के लिए जाने जाते हैं। उनके पांच कहानी-संकलन, एक उपन्यास और लेखों के कई संकलन प्रकाशित हैं। ‘अकथ कहानी’ शीर्षक से उनकी आत्मकथा शीघ्र प्रकाश्य है। इस बातचीत में प्रेमकुमार मणि के जीवन के कई पहलु पहली बार पाठकों के सामने आए हैं।
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Pramod Ranjan deposited ‘कला और साहित्य के केंद्र में जीवन होना चाहिए’ (प्रेमकुमार मणि से प्रमेाद रंजन की बातचीत) in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoहिंदी साहित्यकार व चिंतक प्रेमकुमार मणि अपनी उत्कृष्ट कहानियों और वैचारिक लेखों के लिए जाने जाते हैं। उनके पांच कहानी-संकलन, एक उपन्यास और लेखों के कई संकलन प्रकाशित हैं। ‘अकथ कहानी’ शीर्षक से उनकी आत्मकथा शीघ्र प्रकाश्य है। इस बातचीत में प्रेमकुमार मणि के जीवन के कई पहलु पहली बार पाठकों के सामने आए हैं।
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Pramod Ranjan deposited ‘कला और साहित्य के केंद्र में जीवन होना चाहिए’ (प्रेमकुमार मणि से प्रमेाद रंजन की बातचीत) on Humanities Commons 3 years, 2 months ago
हिंदी साहित्यकार व चिंतक प्रेमकुमार मणि अपनी उत्कृष्ट कहानियों और वैचारिक लेखों के लिए जाने जाते हैं। उनके पांच कहानी-संकलन, एक उपन्यास और लेखों के कई संकलन प्रकाशित हैं। ‘अकथ कहानी’ शीर्षक से उनकी आत्मकथा शीघ्र प्रकाश्य है। इस बातचीत में प्रेमकुमार मणि के जीवन के कई पहलु पहली बार पाठकों के सामने आए हैं।
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Pramod Ranjan deposited ‘हिंदी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावन’ व ‘महिषासुर एक जननायक’: नई सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि की प्रस्तावना in the group
Literary theory on Humanities Commons 3 years, 2 months agoबहुजन साहित्य और संस्कृति की अवधारणा ने पिछले कुछ वर्षों में आकार लेना शुरू किया है। अभी हाल (2016) में आए प्रमोद रंजन द्वारा संपादित तीन संकलन- ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘हिन्दी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’और ‘महिषासुर एक जननायक’- बहुजन साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन की प्रस्तावना और अवधारणा को सामने रखते हैं और इसे पल्लवित-पुष्पित तथा विकसित क…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited ‘हिंदी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावन’ व ‘महिषासुर एक जननायक’: नई सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि की प्रस्तावना in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 2 months agoबहुजन साहित्य और संस्कृति की अवधारणा ने पिछले कुछ वर्षों में आकार लेना शुरू किया है। अभी हाल (2016) में आए प्रमोद रंजन द्वारा संपादित तीन संकलन- ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘हिन्दी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’और ‘महिषासुर एक जननायक’- बहुजन साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन की प्रस्तावना और अवधारणा को सामने रखते हैं और इसे पल्लवित-पुष्पित तथा विकसित क…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited ‘हिंदी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावन’ व ‘महिषासुर एक जननायक’: नई सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि की प्रस्तावना in the group
Festivals, Rituals, Public Spectacles, and Popular Culture on Humanities Commons 3 years, 2 months agoबहुजन साहित्य और संस्कृति की अवधारणा ने पिछले कुछ वर्षों में आकार लेना शुरू किया है। अभी हाल (2016) में आए प्रमोद रंजन द्वारा संपादित तीन संकलन- ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘हिन्दी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’और ‘महिषासुर एक जननायक’- बहुजन साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन की प्रस्तावना और अवधारणा को सामने रखते हैं और इसे पल्लवित-पुष्पित तथा विकसित क…[Read more]
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