• यह एक संस्मरणात्मक ललित निबंध है। इसमें बिहार के कथाकार व राजनेता जाबिर हुसेन, रामधारी सिंह दिवाकर और प्रमोद रंजन के बीच साहित्यिक रचना की स्वायत्तता को लेकर हुए विमर्श का प्रसंग है। लेखक का तर्क है किसी साहित्यिक रचना में उसकी पृष्ठभूमि के उल्लेख से उसकी स्वायत्तता भंग होती है और वह रचना के पूर्ण आस्वाद में बाधक होती है।

  • यह एक संस्मरणात्मक ललित निबंध है। इसमें बिहार के कथाकार व राजनेता जाबिर हुसेन, रामधारी सिंह दिवाकर और प्रमोद रंजन के बीच साहित्यिक रचना की स्वायत्तता को लेकर हुए विमर्श का प्रसंग है। लेखक का तर्क है किसी साहित्यिक रचना में उसकी पृष्ठभूमि के उल्लेख से उसकी स्वायत्तता भंग होती है और वह रचना के पूर्ण आस्वाद में बाधक होती है।

  • प्रमोद रंजन इस लेख के माध्यम से सामाजिक कार्यकर्ता राणा बैनर्जी के बहुमुखी प्रतिभा को सामने लाते हैं। पटना के संस्कृतिकर्मी राणा बैनर्जी ने वर्ष 2008 में गंगा में कूदकर आत्महत्या कर लिया था। जब कवि और लेखक आत्महत्या करने लगे तो यह समझ लेना चाहिए कि देश पर, समाज पर गहरा संकट आनेवाला है। आत्महत्या स्वजनित नहीं होती अपितु परिस्थितिजन्य होती है…[Read more]

  • प्रमोद रंजन इस लेख के माध्यम से सामाजिक कार्यकर्ता राणा बैनर्जी के बहुमुखी प्रतिभा को सामने लाते हैं। पटना के संस्कृतिकर्मी राणा बैनर्जी ने वर्ष 2008 में गंगा में कूदकर आत्महत्या कर लिया था। जब कवि और लेखक आत्महत्या करने लगे तो यह समझ लेना चाहिए कि देश पर, समाज पर गहरा संकट आनेवाला है। आत्महत्या स्वजनित नहीं होती अपितु परिस्थितिजन्य होती है…[Read more]

  • प्रमोद रंजन इस लेख के माध्यम से सामाजिक कार्यकर्ता राणा बैनर्जी के बहुमुखी प्रतिभा को सामने लाते हैं। पटना के संस्कृतिकर्मी राणा बैनर्जी ने वर्ष 2008 में गंगा में कूदकर आत्महत्या कर लिया था। जब कवि और लेखक आत्महत्या करने लगे तो यह समझ लेना चाहिए कि देश पर, समाज पर गहरा संकट आनेवाला है। आत्महत्या स्वजनित नहीं होती अपितु परिस्थितिजन्य होती है…[Read more]

  • After Ram, Krishna will come under attack from Hindutva forces in India. Hindutva organizations are active in this direction. This article, published in February 2012, explains how the background has been created through the court’s decision.

  • भारत की हिंदुत्ववादी ताकतों के निशाने पर राम के बाद कृष्ण आएंगे। अनेक संगठन इसके लिए सक्रिय हैं। फरवरी, 2012 में प्रकाशित इस लेख में बताया गया है कि किस प्रकार न्यायालय के फैसले के जरिए इसकी पृष्ठभूमि बनाई गई है।

  • प्रमोद रंजन और उनकी टीम द्वारा वर्ष 2009 में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया था कि बिहार की पत्रकारिता में फैसला लेने वालों पदों पर एक भी दलित, पिछड़ा, आदिवासी नहीं है। फैसला लेने वाले पदों पर स्त्रियों की भागीदारी भी शून्य है। इस सर्वेक्षण में प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक दोनों माध्यमों को लिया गया था तथा इसमें हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू के मीडिया संस…[Read more]

  • यह लेख अप्रैल, 2011 के अंत में लिखा गया था। उस समय अन्ना हजारे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चरम पर था। इस लेख में इस आंदोलन के दलित-बहुजन विरोधी चरित्र को उजागर किया गया है।

    लेख में बताया गया है कि किन कारणों से कॉरपोरेट घराने इस आंदोलन के समर्थक थे और किस प्रकार इसके मूल में लोकतंत्र की अवमानना निहित थी।

  • 16 सितबर, 2011 को बिहार विधान परिषद् ने अपने दो कर्मचारियों- अरुण नारायण और मुसाफिर बैठा निलंबित कर दिया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने परिषद् सभापति के निर्णय पर अपने एक फेसबुक पोस्ट में सवाल उठाया था। इससे पहले परिषद् ने अपने एक और कर्मचारी सैयद जावेद हुसेन को भी नौकरी से बर्खास्त कर दिया था।
    यह टिप्प्णी इसी संदर्भ में है।

  • मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27 जनवरी, 2012 के अपने फैसले में राज्य की भाजपा सरकार द्वारा स्कूलों में ‘गीता सार’ पढ़ाए जाने को उचित ठहराते हुए कहा था कि गीता हिंदू धर्म ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन है। यह टिप्पणी उसी संदर्भ में है।

  • On 27 January, 2012 Justices Ajit Singh and Sanjay Yadav of the Madhya Pradesh High Court in Jabalpur while approving the decision of the BJP government to teach “the essence of Gita” in the schools said that Gita is not merely a religious text. It is Indian philosophy. Therefore, it is not inappropriate to teach it in schools.

    Forces that sup…[Read more]

  • यह एक संस्मरणात्मक ललित निबंध है। इसमें बिहार के कथाकार व राजनेता जाबिर हुसेन, रामधारी सिंह दिवाकर और प्रमोद रंजन के बीच साहित्यिक रचना की स्वायत्तता को लेकर हुए विमर्श का प्रसंग है। लेखक का तर्क है किसी साहित्यिक रचना में उसकी पृष्ठभूमि के उल्लेख से उसकी स्वायत्तता भंग होती है और वह रचना के पूर्ण आस्वाद में बाधक होती है।

  • प्रमोद रंजन, सामाजिक कार्यकर्ता राणा बैनर्जी के बहुमुखी प्रतिभा को इस लेख के माध्यम से सामने लाते हैं। राणा बैनर्जी ने आत्महत्या कर लिया था। जब कवि और लेखक आत्महत्या करने लगे तो यह समझ लेना चाहिए कि देश पर, समाज पर गहरा संकट आनेवाला है। आत्महत्या स्वजनित नहीं होती अपितु परिस्थितिजन्य होती है। रंजन यह बताते है कि बेईमान आदमी कभी आत्महत्या नहीं कर सकता।

  • 27 अक्टूबर, 2008 को एक बिहारी नवयुवक राहुल राज की मुंबई पुलिस ने हत्या कर दी थी। इसके बाद बिहार में युवाओं ने व्यापक आंदोलन किया था। कई जगहों पर तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं हुईं थीं। कई दिनों तक राजधानी पटना ठप रही थी। इस संबंध में आरोप-प्रत्यारोप की लंबी राजनीति चली थी और राहुल राज को बिहारी अस्मिता के प्रतीक के रूप में देखा गया था। इ…[Read more]

  • 27 अक्टूबर, 2008 को एक बिहारी नवयुवक राहुल राज की मुंबई पुलिस ने हत्या कर दी थी। इसके बाद बिहार में युवाओं ने व्यापक आंदोलन किया था। कई जगहों पर तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं हुईं थीं। कई दिनों तक राजधानी पटना ठप रही थी। इस संबंध में आरोप-प्रत्यारोप की लंबी राजनीति चली थी और राहुल राज को बिहारी अस्मिता के प्रतीक के रूप में देखा गया था। इ…[Read more]

  • 27 अक्टूबर, 2008 को एक बिहारी नवयुवक राहुल राज की मुंबई पुलिस ने हत्या कर दी थी। इसके बाद बिहार में युवाओं ने व्यापक आंदोलन किया था। कई जगहों पर तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं हुईं थीं। कई दिनों तक राजधानी पटना ठप रही थी। इस संबंध में आरोप-प्रत्यारोप की लंबी राजनीति चली थी और राहुल राज को बिहारी अस्मिता के प्रतीक के रूप में देखा गया था। इ…[Read more]

  • खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण किन्नौर का समाज व संस्कृति शेष भारत से अलग है। यह बौद्ध धर्म का इलाका है, जिसे हिंदूवादी संस्कृति लीलती जा रही है। आर्थिक संपन्नता के आगमन से जाति-आधारित उत्पीड़न और भेदभाव कम हो रहा है। प्रमोद रंजन ने इस यात्रा संस्मरण में किन्नौर की विशिष्ट संस्कृति, बहु पत्नी प्रथा, वहां के समाज और राजनीति…[Read more]

  • खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण किन्नौर का समाज व संस्कृति शेष भारत से अलग है। यह बौद्ध धर्म का इलाका है, जिसे हिंदूवादी संस्कृति लीलती जा रही है। आर्थिक संपन्नता के आगमन से जाति-आधारित उत्पीड़न और भेदभाव कम हो रहा है। प्रमोद रंजन ने इस यात्रा संस्मरण में किन्नौर की विशिष्ट संस्कृति, बहु पत्नी प्रथा, वहां के समाज और राजनीति…[Read more]

  • खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण किन्नौर का समाज व संस्कृति शेष भारत से अलग है। यह बौद्ध धर्म का इलाका है, जिसे हिंदूवादी संस्कृति लीलती जा रही है। आर्थिक संपन्नता के आगमन से जाति-आधारित उत्पीड़न और भेदभाव कम हो रहा है। प्रमोद रंजन ने इस यात्रा संस्मरण में किन्नौर की विशिष्ट संस्कृति, बहु पत्नी प्रथा, वहां के समाज और राजनीति…[Read more]

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Pramod Ranjan

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