• हिंदी कथाकार राजकुमार राकेश और प्रमोद रंजन की यह लंबी बातचीत शिमला में जनवरी, 2003 में हुई थी, जिसे पटना से जाबिर हुसेन के संपादन में प्रकाशित पत्रिका दोआबा ने जून, 2007 अंक में प्रकाशित किया था। उसी वर्ष इसे इसे पटना के मंडल विचार प्रकाशन ने एक पुस्तिका के रूप में भी प्रकाशित किया था। इस बातचीत में जादूई यथार्थवाद, मार्क्सवाद, दलित व…[Read more]

  • Entrada sobre Eurocentrismo en el Diccionario de Injusticias editado por Carlos Pereda. // Dictionary Entry on Eurocentrism (in Spanish), my contribution to the Diccionario de Injusticias (A Dictionary of Injustices) edited by Carlos Pereda

  • कोरोना की आड़ में जो कुछ हुआ है, उस पर नजर रखना आवश्यक है। ऐसी अनेक छोटी-छोटी घटनाएं हैं, जिनकी ओर प्राय: हमारी नजर नहीं जाती। वैश्विक स्वास्थ्य बाजार के किंग पिन माने जाने बिल गेट्स इनमें से अधिकांश घटनाओं से आपको जुड़े हुए दिखाई देते हैं। ऐसा ही एक मामला वीडियो कॉलिंग की सर्विस देने वाले ‘जूम’ से संबंधित था।

    वस्तुत: यह सब सिर्फ व्यापा…[Read more]

  • प्रेमकुमार मणि की यह संपादकीय टिप्पणी पटना से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘जन विकल्प’ की साहित्य वार्षिकी, 2008 में प्रकाशित हुई थी। यह टिप्पणी ‘समय से संवाद’ पुस्तक में भी संकलित है।
    जन विकल्प के संपादक प्रेमकुमार मणि और प्रमोद रंजन थे।

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Maciej Junkiert

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