• त्रिवेणी संघ की सक्रियता का काल 1933 से लेकर 1942 ईसवी तक माना जाता है। इस समय ”बीसवीं सदी अपने शैशवकाल को समाप्त कर युवावस्था को प्राप्त कर रही थी। ’जागरूक होते पिछड़े-दलित समुदायों और उनके दमन, शोषण की चौतरफा कोशिश के बीच जन्मे त्रिवेणी संघ का ”उद्देश्य तथा कार्यक्रम शोषित, शासित तथा दलित यानी सभी अनुन्नत समाज की उन्नति’’ था। उसने उद्घोष क…[Read more]

  • यह आलेख भारतीय साहित्य में उभर रही बहुजन अवधारणा को रेखांकित करता है।
    इस लेख में बताया गया है कि “बहुजन साहित्य का अर्थ है– अभिजन के विपरीत बहुजन का साहित्य और उनकी वैचारिकी। प्रगतिशील- मार्क्सवादी विचारधारा में जो ‘जन’ है, ‘बहुजन’ उसकी अगली कड़ी भी है। मार्क्सवाद के ‘जन’ का अर्थ भारत के सामाजिक-यथार्थ के संदर्भ में न सिर्फ अस्पष्ट और अनिश्…[Read more]

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Laura Keyt

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