• This article introduces educational human resource researchers to Minnesota’s unique tax-base sharing program in the Twin Cities metro region. It also introduces a social justice methodology called cooperation analysis for school finance research, and specif-
    ically its concept of structural justice. It applies cooperation analysis to tax-base s…[Read more]

  • फ़रवरी, 2020 तक भारतीय अख़बारों में दुनिया में एक नये वायरस के फैलने की सूचना प्रमुखता से आने लगी थी।
    अख़बारों ने हमें बताया कि कोविड-19 सबसे अधिक जानलेवा है। लेकिन यह नहीं बताया कि हमारी हिंदी पट्टी में टी.बी, चमकी बुख़ार, न्यूमोनिया, मलेरिया आदि से मरने वालों की एक विशाल संख्या है। इन बीमारियों से सिर्फ़ हिंदी पट्टी में हर साल 5 से 7 लाख…[Read more]

  • पेरियार के मूल तमिल लेखन का हिंदी अनुवाद उपलब्ध नहीं था, इस कारण उनकी वैचारिकी से हिंदी क्षेत्रों के दलित-बहुजन आंदोलन का उस तरह का सघन और सक्रिय रिश्ता विकसित नहीं हो था, जैसा कि डॉ. आम्बेडकर और बहुत हद तक जोतिराव फुले से हो सका है। इस कमी को प्रमोद रंजन द्वारा 2020 में संपादित पेरियार पर केंद्रित तीन पुस्तकों की ऋंखला ने पूरा किया। ये पु…[Read more]

  • In the course, I give a basic introduction into some of the recent developments in the field of computational historical linguistics. While this field is predominantly represented by phylogenetic approaches with whom scholars try to infer phylogenetic trees from different kinds of language data, the approach taken here is much broader,…[Read more]

  • The weblog Computer-Assisted Language Comparison in Practice, published on the Hypotheses platform for scientific blogging (https://calc.hypotheses.org/), offers tutorials and discussion notes on computer-assisted approaches to the history and diversity of languages. A substantial part of its content is contributed as part of the ERC Starting…[Read more]

  • MAD HARRY! * QRt by PRURITUS MIGRANS * CC: BY-ND

  • The University of Florida and the University of North Florida will host their first Latin America & Caribbean Digital Humanities Symposium at the George A. Smathers Libraries in Gainesville FL on Friday, March 3, 2023.

    We seek proposals for papers, posters, and lightning rounds, on any topic related to Digital Humanities focusing on Latin America…[Read more]

  • इस पुस्तिका में बिहार की कोसी नदी में वर्ष 2008 में आई प्रलयंकारी बाढ़ का आंखों देखा वर्णन है। बाढ़ में हजारों लोग मारे गए थे, लेकिन बिहार में सत्ता पर काबिज पार्टी ने इस त्रासदी काे एक जाति विशेष को सबक सिखाने के अवसर के रूप में लिया था। इसका तथ्यात्मक ब्यौरा इसमें है। साथ ही इसमें बेघर हुए लोगों की मर्मांतक पीड़ा का भी चित्रण है।…[Read more]

  • This is the English edition of the book ‘Mahishasur: Ek Jannayak’. The book searches for a hero who has been ever-present in the memories, traditions, festivals, and celebrations of a majority of the people of India but who the dominant culture of the country has given the image of a villain. Recently, the search for this people’s hero triggered a…[Read more]

  • हिंदी में पेरियार का मूल लेखन और जीवनी उपलब्ध नहीं थी। सामाजिक आंदोलनों व अकादमियों में जो नई हिंदी भाषी पीढ़ी आई है, वह ‘नास्तिक पेरियार’ से तो खूब परिचित है और उनके प्रति उसमें जबर्दस्त आकर्षण भी है, लेकिन यह पीढ़ी उनके विचारों के बारे में कुछ सुनी-सुनाई, आधी-अधूरी बातें ही जानती है। वस्तुतः उसने पेरियार को पढ़ा नहीं है।
    उनकी ‘द…[Read more]

  • यह किताब ई.वी. रामासामी नायकर ‘पेरियार’ (17 सितम्बर, 1879—24 दिसम्बर, 1973) के दार्शनिक व्यक्तित्व से परिचित कराती है। धर्म, ईश्वर और मानव समाज का भविष्य उनके दार्शनिक चिन्तन का केन्द्रीय पहलू रहा है। उन्होंने मानव समाज के सन्दर्भ में धर्म और ईश्वर की भूमिका पर गहन चिन्तन-मनन किया है। इस चिन्तन-मनन के निष्कर्षों को इस किताब के विविध लेखों मे…[Read more]

  • प्रमोद रंजन द्वारा संपादित पुस्तक “महिषासुर एक जननायक” का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि आखिर महिषासुर नाम से शुरू किया गया यह आन्दोलन है क्या? इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके निहितार्थ क्या हैं? इस पुस्तक में प्रश्न उठाया गया है कि जब असुर एक प्रजाति है तो उसकी हार या उसके नायक की ह्त्या का उत्सव किस सांस्कृतिक मनोवृत्ति का परिचायक…[Read more]

  • महिषासुर से संबंधित बहुजन समाज के मिथकों व परंपराओं , पौराणिक मिथकों और आधुनिक युग में गढे़ गए मिथकों के अर्थों को खोलने वाली इस पुस्तक का संपादक प्रमोद रंजन ने किया है। इस पुस्तक में पहली बार महिषासुर शहादत/स्मरण दिवस की विस्तृत सैद्धांतिकी भी प्रस्तुत की गई है तथा इस संबंध में उठने वालो सभी सवालों के उत्तर प्रस्तुत किये गये हैं।…[Read more]

  • ‘समय से संवाद: जनविकल्प संचयिता’ नाम यह पुस्तक हिंदी मासिक ‘जन विकल्प’ में प्रकाशित प्रतिनिधि सामग्री का संकलन है। प्रेमकुमार मणि और प्रमोद रंजन के संपादन में पटना से वर्ष 2007 में प्रकाशित इस पत्रिका की जनपक्षधरता, निष्पक्षता और मौलिक त्वरा ने समाजकर्मियों और बुद्धिजीवियों को गहराई से आलोड़ित किया था। इस पुस्तक में जिन लेखों और साक्षात्कारों…[Read more]

  • ‘भारत के राजनेता’ शीर्षक शृंखला की यह किताब भारत में पसमांदा आन्दोलन के सूत्रधार तथा राज्यसभा सांसद ‘अली अनवर’ की संसदीय सहभागिता और संसद में सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर उनकी पहलों पर केंद्रित है। संसद में विविध मसलों पर उनके वक्तव्यों, दर्ज भाषणों, हस्तक्षेपों, स्पेशल मेंशन तथा साक्षात्कार के माध्यम से उनके सरोकारों को समझने की गंभीर कोशिश य…[Read more]

  • यह पुस्तक मूल रूप से हिंदी में वर्ष 2016 में ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। उसका यह अंग्रेजी अनुवाद भी उसी वर्ष प्रकाशित हुआ था। यह किताब हिन्दी और भारतीय भाषाओं में बहुजन साहित्य की अवधारणा पर विमर्श प्रस्तुत करती है। एक ओर यह किताब हिंदी साहित्य में हो रहे बदलावों पर नजर रखती है दूसरी ओर मंडल कमीशन के लागू होने के बाद ब…[Read more]

  • यह पुस्तक मूल रूप से हिंदी में वर्ष 2016 में ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। उसका यह अंग्रेजी अनुवाद भी उसी वर्ष प्रकाशित हुआ था। यह किताब हिन्दी और भारतीय भाषाओं में बहुजन साहित्य की अवधारणा पर विमर्श प्रस्तुत करती है। एक ओर यह किताब हिंदी साहित्य में हो रहे बदलावों पर नजर रखती है दूसरी ओर मंडल कमीशन के लागू होने के बाद ब…[Read more]

  • इस पुस्तक में बहुजन साहित्य की अवधारणा की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। बहुजन साहित्य की अवधारणा का पैमाना लेखक का कुल लेखकीय-वैचारिक अवदान है। इसलिए द्विज समुदाय से आने वाले ऐसे लेखकों के लिए भी इसमें स्थान है, जिनकी दृढ पक्षधरता इन वंचित तबकों के प्रति हो। जैसा कि हम फारवर्ड प्रेस में कहते आए हैं कि यह अवधारणा उस व…[Read more]

  • इस पुस्तक में बहुजन साहित्य की अवधारणा की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। बहुजन साहित्य की अवधारणा का पैमाना लेखक का कुल लेखकीय-वैचारिक अवदान है। इसलिए द्विज समुदाय से आने वाले ऐसे लेखकों के लिए भी इसमें स्थान है, जिनकी दृढ पक्षधरता इन वंचित तबकों के प्रति हो। जैसा कि हम फारवर्ड प्रेस में कहते आए हैं कि यह अवधारणा उस व…[Read more]

  • यह किताब बहुजन डाइवर्सिटी द्वारा 2007 से शुरू की गई भारत की ज्वलंत समस्याएं शृंखला की है। पुस्तक में समय समय पर उद्भव होने वाली कुछ ख़ास समस्याओं, जिनसे राष्ट्र का जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है एवं जिन्हें मीडिया के अल्पकालिक प्रभाव के चलते लोग एक अंतराल के बाद विस्मृत कर समस्याओं के अम्बार में घिरे देश की दूसरी समस्याओं में खो जाते हैं, को यद…[Read more]

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John Mark R. Asio

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Active 4 years, 4 months ago