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Pramod Ranjan deposited गीता हिंदू धर्मग्रंथ नहीं, भारतीय दर्शन है! in the group
Philosophy of Religion on Humanities Commons 3 years agoमध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27 जनवरी, 2012 के अपने फैसले में राज्य की भाजपा सरकार द्वारा स्कूलों में ‘गीता सार’ पढ़ाए जाने को उचित ठहराते हुए कहा था कि गीता हिंदू धर्म ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन है। यह टिप्पणी उसी संदर्भ में है।
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Pramod Ranjan deposited टिप्पणियों के खिलाफ एक लंबी टिप्पणी in the group
Literary theory on Humanities Commons 3 years agoयह एक संस्मरणात्मक ललित निबंध है। इसमें बिहार के कथाकार व राजनेता जाबिर हुसेन, रामधारी सिंह दिवाकर और प्रमोद रंजन के बीच साहित्यिक रचना की स्वायत्तता को लेकर हुए विमर्श का प्रसंग है। लेखक का तर्क है किसी साहित्यिक रचना में उसकी पृष्ठभूमि के उल्लेख से उसकी स्वायत्तता भंग होती है और वह रचना के पूर्ण आस्वाद में बाधक होती है।
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Pramod Ranjan deposited राणा बैनर्जी: नया नहीं इस जीवन में मरना in the group
Philosophy of Religion on Humanities Commons 3 years agoप्रमोद रंजन इस लेख के माध्यम से सामाजिक कार्यकर्ता राणा बैनर्जी के बहुमुखी प्रतिभा को सामने लाते हैं। पटना के संस्कृतिकर्मी राणा बैनर्जी ने वर्ष 2008 में गंगा में कूदकर आत्महत्या कर लिया था। जब कवि और लेखक आत्महत्या करने लगे तो यह समझ लेना चाहिए कि देश पर, समाज पर गहरा संकट आनेवाला है। आत्महत्या स्वजनित नहीं होती अपितु परिस्थितिजन्य होती है…[Read more]
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Pramod Ranjan deposited “बचपन की वे छवियां मुझे जीवन के जादू की ओर खींचती हैं” in the group
Literary theory on Humanities Commons 3 years agoहिंदी कथाकार राजकुमार राकेश और प्रमोद रंजन की यह लंबी बातचीत शिमला में जनवरी, 2003 में हुई थी, जिसे पटना से जाबिर हुसेन के संपादन में प्रकाशित पत्रिका दोआबा ने जून, 2007 अंक में प्रकाशित किया था। उसी वर्ष इसे इसे पटना के मंडल विचार प्रकाशन ने एक पुस्तिका के रूप में भी प्रकाशित किया था। इस बातचीत में जादूई यथार्थवाद, मार्क्सवाद, दलित व…[Read more]
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