• On Relationalities: Politics, Narrative, Sociality

    A one-day hybrid symposium to be hosted by the Centre for Applied Philosophy, Politics and Ethics (CAPPE) at the University of Brighton (UK).

    Date: Wednesday 5 April 2023

    Location: University of Brighton, City Campus, M2, and online

    Keynote speaker: Dr Leticia Sabsay (LSE)

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  • यह पुस्तक मूल रूप से हिंदी में वर्ष 2016 में ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। उसका यह अंग्रेजी अनुवाद भी उसी वर्ष प्रकाशित हुआ था। यह किताब हिन्दी और भारतीय भाषाओं में बहुजन साहित्य की अवधारणा पर विमर्श प्रस्तुत करती है। एक ओर यह किताब हिंदी साहित्य में हो रहे बदलावों पर नजर रखती है दूसरी ओर मंडल कमीशन के लागू होने के बाद ब…[Read more]

  • इस पुस्तक में बहुजन साहित्य की अवधारणा की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। बहुजन साहित्य की अवधारणा का पैमाना लेखक का कुल लेखकीय-वैचारिक अवदान है। इसलिए द्विज समुदाय से आने वाले ऐसे लेखकों के लिए भी इसमें स्थान है, जिनकी दृढ पक्षधरता इन वंचित तबकों के प्रति हो। जैसा कि हम फारवर्ड प्रेस में कहते आए हैं कि यह अवधारणा उस व…[Read more]

  • यह किताब बहुजन डाइवर्सिटी द्वारा 2007 से शुरू की गई भारत की ज्वलंत समस्याएं शृंखला की है। पुस्तक में समय समय पर उद्भव होने वाली कुछ ख़ास समस्याओं, जिनसे राष्ट्र का जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है एवं जिन्हें मीडिया के अल्पकालिक प्रभाव के चलते लोग एक अंतराल के बाद विस्मृत कर समस्याओं के अम्बार में घिरे देश की दूसरी समस्याओं में खो जाते हैं, को यद…[Read more]

  • भारत के राजनेता शीर्षक शृंखला की यह किताब महाराष्ट्र के राजनेता, आरपीआई(अ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा राज्यसभा सांसद ‘रामदास आठवले’ की संसदीय सहभागिता और संसद में सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर उनकी पहलों पर केंद्रित है। आठवले महाराष्ट्र में सामाजिक न्याय मंत्री के रूप में अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर पिछले तीन दशक से राज्य और केंद्र की राजनीति में अप…[Read more]

  • जाति और पितृसत्ता ई. वी. रामासामी नायकर के चिंतन, लेखन और संघर्षों की केंद्रीय धुरी रही है। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि इन दोनों के विनाश के बिना किसी आधुनिक समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है।
    जाति और पितृसत्ता के संबंध में पेरियार क्या सोचते थे और क्यों वे इसके विनाश को आधुनिक भारत के निर्माण के लिए अपरिहार्य एवं अनिवार्य मानते थे? इन प्रश्नों…[Read more]

  • सच्ची रामायण, पेरियार ई. वी. रामासामी की बहुचर्चित और सबसे विवादास्पद कृति रही है। पेरियार रामायण को एक राजनीतिक ग्रंथ मानते थे। उनका कहना था कि इसे दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज ठहराने के लिए लिखा गया और यह गैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व का उपकरण है। यह किताब हिंदी में 1968में ‘स…[Read more]

  • This book was originally published in Hindi with the title ‘Bahujan Sahitya ki Prastavan” [Introduction to Bahujan Literature] in the year 2016. Its English translation was also published in the same year. This book presents a discussion on the concept of Bahujan literature in Hindi and Indian languages. On the one hand, this book monitors the…[Read more]

  • शिमला डायरी हिंदी पत्रकार और लेखक प्रमोद रंजन के संस्मरणों की पुस्तक है, जिसका केंद्रबिंदु साहित्यिक गतिविधियां हैं। यह पुस्तक 21वीं सदी की शुरुआत में पत्रकारिता के नैतिक पतन की कहानी भी कहती है। हिमाचल प्रदेश पर केंद्रित इस पुस्तक में तत्कालीन राजनीति की भी झलक है।

  • प्रमोद रंजन का ‘विश्वास का धंधा’ शीर्षक यह लेख हिंदी दैनिक जनसत्ता के 30 अगस्त, 2009 के अंक में प्रकाशित हुआ था। इस लेख के प्रकाशन के बाद हिंदी पत्रकारिता में जातिवाद के सवाल पर बड़ा विवाद हुआ था।

    इससे संबंधित घटनाक्रम इस प्रकार था: प्रमोद रंजन का उपरोक्त लेख उनकी पुस्तिका ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ में संकलित भी था। उस पुस्तिका की भी ब…[Read more]

  • भारत में क्या हालत हो चुकी है, इसका अनुमान दिसंबर, 2020 में हुए एक सर्वेक्षण से लगता है। इस सर्वेक्षण के अनुसार भारत की आधी से अधिक आबादी को कोरोना-काल में पहले की तुलना में कम भोजन मिल रहा है। इनमें ज़्यादातर दलित और आदिवासी हैं।

    लेकिन इन सूचनाओं से भी अधिक भयावह यह है कि भारत का बौद्धिक वर्ग, ग़रीबों के सर पर मँडराते मौत के इस साये से प्…[Read more]

  • भारत में क्या हालत हो चुकी है, इसका अनुमान दिसंबर, 2020 में हुए एक सर्वेक्षण से लगता है। इस सर्वेक्षण के अनुसार भारत की आधी से अधिक आबादी को कोरोना-काल में पहले की तुलना में कम भोजन मिल रहा है। इनमें ज़्यादातर दलित और आदिवासी हैं।

    लेकिन इन सूचनाओं से भी अधिक भयावह यह है कि भारत का बौद्धिक वर्ग, ग़रीबों के सर पर मँडराते मौत के इस साये से प्…[Read more]

  • यह अध्ययन बताता है कि भारत में ऊंची कही जाने वाले जातियों और अन्य पिछड़ी, दलित, आदिवासी जातियों की औसत उम्र में बहुत अंतर है।

    सामान्यत: आदिवासी समुदाय से आने वाले लोग सबसे कम उम्र में मरते हैं, उसके बाद दलितों का नंबर आता है, फिर अन्य पिछड़ा वर्गों का। एक औसत सवर्ण हिंदू इन बहुजन समुदायों से बहुत अधिक वर्षों…[Read more]

  • मीडिया में हिस्सेदारी से मेरा आशय केवल मीडिया की आन्तरिक संरचना में हिस्सेदारी से नहीं है। मेरा मतलब है कि वंचित तबकों की अभिव्यक्ति की कितनी हिस्सेदारी है उसमें। उसकी एक भूमिका के तौर पर मैंने कुछ काम किया था यह देखने के लिए कि कितने लोग हैं वंचित तबकों के मीडिया में। उससे यह जुड़ता है। हमारे सामने सवाल है कि हिन्दी-…[Read more]

  • The coronavirus-induced lockdown hasn’t just eroded our physical liberty; it has also eroded our intellectual freedom. Our freedom to think has been put under lock and key. Clearly, we are on the threshold of a dangerous phase. Which way we go from here will depend on how soon and how well we gauge the danger and start exploring the ways to c…[Read more]

  • Wissenschaftler und Denker haben sich widerstandslos für die Durchsetzung der herrschenden Corona-Agenda einspannen lassen.

    Der durch das Coronavirus veranlasste Lockdown hat nicht nur unsere körperliche Freiheit ausgehöhlt, sondern auch unsere geistige Freiheit untergraben. In vielen Ländern wurde für das Denken Käfighaltung angeordnet. Offen…[Read more]

  • “Corona-Tote“ — man denkt dabei nur an Menschen, die in der Folge einer Virusinfektion verstorben sind. Dabei zeichnet sich schon jetzt ab, dass die Todeszahlen infolge der unter Verweis auf Corona ergriffenen „Maßnahmen“ weltweit um ein Vielfaches höher sein werden. Je mehr Zeit vergeht, umso größer dürfte diese Differenz ausfallen. Weil aber ni…[Read more]

  • दिनों-दिन उपन्यास और कहानियां “पढ़ना” कठिन होता जा रहा है। साहित्य संबंधी लेखन-अध्यापन में लगे हम लोगों को पढ़ने काम अक्सर एक पेशागत काम की तरह करना पड़ता है। ऐसा साहित्य हिंदी में बहुत कम आ भी रहा है जिसे पढ़ कर बहुत कुछ नया मिलने की उम्मीद जगे। वस्तुत: बात सिर्फ हिंदी की नहीं है, परंपरागत रूप से जिसे हम विशुद्ध साहित्य कहते हैं, वह अब अपने समय…[Read more]

  • अधिकांश लोग समझते हैं कि चिकित्सक ही जांच द्वारा तय करते हैं कि किसे कोविड है और किसे नहीं तथा अगर किसी की मौत होती है तो चिकित्सक ही यह तय करते हैं कि वह मृत्यु कोविड से हुई है या किसी अन्य कारण से। इसलिए जब कोई खुद को चिकित्सक बताता है या अपने परिवार में चिकित्सकों के होने का ज़िक्र करता है तो लोग उसकी बात पर अनिवार्य रूप से विश्वास करते ह…[Read more]

  • As was expected, the country is witnessing an explosion of Covid cases, leading to chaos and mayhem. People are dying for want of oxygen. The protocol for the treatment of Covid patients is faulty and that is one reason for the high number of deaths. Thanks to the protocol, deaths due to other causes are also being added to the Covid toll. In this…[Read more]

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David Adler

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Active 3 years, 2 months ago