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Pramod Ranjan deposited सामाजिक न्याय की अवधारणा पर खतरे in the group
Sociology on Humanities Commons 2 years, 8 months ago समाजिक न्याय की अवधारणा क्या है? भारत में सामाजिक न्याय का संघर्ष मुख्य रूप से द्विजों और शूद्रों-अतिशूद्रों-आदिवासियों के बीच है। द्विज अल्पसंख्यक हैं जबकि शुद्र-अतिशूद्र-आदिवासी बहुसंख्यक। देश के लोकतंत्र पर राज करने वाली दोनों प्रमुख पार्टियां – कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी – अपने संगठन में ओबीसी प्रकोष्ठ, दलित प्रकोष्ठ, आदिवासी प्रकोष्ठ आदि रखती हैं। यह बहुजन तबकों के संघर्षों को एक प्रकार से कोष्ठकों में बंद करने का तरीका है। जब ये बहुजन समुदाय उनके प्रकोष्ठों में बंद हो जाते हैं तो स्वत: ही अल्पसंख्यक द्विज भारतीय राजनीति की मुख्यधारा बन जाते हैं। बहुजनों का काम सिर्फ इतना रह जाता है कि वे संसद, मंत्रीमंडल में अपने समुदाय के प्रतिनिधियों तथा प्रधानमंत्री कार्यालय और अन्य प्रमुख सत्ता संस्थानों में अपने समुदायों के अधिकारियों की घटती-बढती संख्या की गिनती करते रहें! भारतीय राजनीति ने इस वर्चस्व को बनाए रखने के लिए ‘अल्पसंख्यक’ शब्द के अर्थ को ही भ्रामक बना दिया है। आज भारतीय राजनीति में इसका प्रचलित अर्थ है मुसलमान। मुसलमानों के लिए सभी पार्टियों में अलग प्रकोष्ठ होते हैं। देश में 13.4 फीसदी आबादी की हिस्सेदारी रखने वाले मुसलमान वास्तविक अल्पसंख्यक नहीं हैं, वोटों की संख्या की दृष्टि से तो कतई नहीं। अगर मुसलमान अल्पसंख्यक हैं तो बहुसंख्यक कौन है? कोई कह सकता है कि हिंदू बहुसंख्यक हैं। तो फिर हिंदुओं के लिए दलित प्रकोष्ठ और ओबीसी प्रकोष्ठ क्यों हैं? लोकतंत्र में यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि बहुसंख्यक कौन है। यही कारण है कि मुसलमानों का पसमांदा (शूद्र) तबका तथा दलित, बहुजन और आदिवासी तथा अन्य वास्तविक अल्पसंख्यक ईसाई (2.3 प्रतिशत) और बौद्ध (0.8 प्रतिशत) को मिलाकर जिस ‘बहुजन’की अवधारणा तैयार होती है, उसे तोडने के लिए भारत का प्रभु वर्ग इस प्रकार की तिकडमें राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अपनाता है। दूसरी ओर, बहुसंख्यकवाद और समाजिक न्याय एक दूसरे के एकदम विपरीत हैं। इसलिए बहुजनवाद और बहुसंख्यकवाद के बीच के फर्क को भी समझना चाहिए..