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Pramod Ranjan deposited बहुजन साहित्य और आलोचना in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 2 years, 10 months ago यह फारवर्ड प्रेस की बहुजन साहित्य वार्षिकी: 2013 का संपादकीय है। इसमें बहुजन साहित्य और बहुजन आलोचना की अवधारणा पर संक्षेप में बात की गई है।
आलेख में कहा गया है कि बहुजन साहित्य का विकास वस्तुत: बहुजन आलोचना का विकास है। जैसे-जैसे हम बहुजन साहित्य को चिन्हित करते जाएंगे, अभिजन साहित्य स्वत: ही हाशिए का साहित्य बनता जाएगा क्योंकि हिंदी साहित्य का अधिकांश हिस्सा बहुजन साहित्य ही है।