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Pramod Ranjan deposited महिषासुर से संबंधित परंपराओं और आंदोलन के निहितार्थ in the group
Religious Studies on Humanities Commons 2 years, 11 months ago महिषासुर आंदोलन के इस कदर अचानक फैल जाने का एक बड़ा कारण था कि बहुजन समाज में इन परंपराओं की जड़ें बहुत गहरी रही हैं और इनका प्रसार उसके अवचेतन तक रहा है। इन समुदायों से आने वाले फुले, आंबेडकर, पेरियार समेत सभी चिंतकों ने असुर-संस्कृति की न सिर्फ विस्तृत गवेषणा की है, बल्कि अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि यही उनकी वैचारिकी का प्रस्थान बिंदु भी रहा है और उनके वांग्मय में अच्छी-खासी जगह घेरता है। जेएनयू में 2047 में आयोजित महिषासुर शहादत दिवस ने तो सिर्फ खाद का काम किया, खेतों में बीज पहले से थे और नमी काफी समय से तैयार हो रही थी। इस विमर्श के सतह पर आने के बाद लोग अपनी कल्पनाशीलता का प्रयोग कर अपने लोक- जीवन का उससे मिलान कर रहे हैं और इसे अपने करीब पा रहे हैं