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Pramod Ranjan deposited साहित्य का नया रास्ता in the group
Book Reviewing on Humanities Commons 3 years, 1 month ago दिनों-दिन उपन्यास और कहानियां “पढ़ना” कठिन होता जा रहा है। साहित्य संबंधी लेखन-अध्यापन में लगे हम लोगों को पढ़ने काम अक्सर एक पेशागत काम की तरह करना पड़ता है। ऐसा साहित्य हिंदी में बहुत कम आ भी रहा है जिसे पढ़ कर बहुत कुछ नया मिलने की उम्मीद जगे। वस्तुत: बात सिर्फ हिंदी की नहीं है, परंपरागत रूप से जिसे हम विशुद्ध साहित्य कहते हैं, वह अब अपने समय की संवेदना, तेजी से बदलते यथार्थ और उपभोक्ता की जरूरतों की नब्ज पकड़ने में सफल नहीं हो रहा। ऐसा क्यों है? लेखक पिछड़ गए हैं या प्रिंट नामक वह माध्यम पुराना पड़ गया है जिसमें हम पिछले लगभग छह सौ सालों से साहित्य को प्रसारित करने के आदी रहे हैं? या फिर ‘साहित्य’ ही अप्रासंगिक हो गया है? संभवत: संकट दुहरा है। एक ओर प्रिंट माध्यम में काम करने वाले लेखक अपने समय से पिछड़े हुए हैं, दूसरी ओर यह माध्यम भी पुराना पड़ गया है।
साहित्य एक नए रास्ते पर चल पड़ा है। प्रिंट की एकरसता की जगह वह बहुआयामी माध्यमों के बीच निर्मित-प्रसारित हो रहा है और करोड़ो-करोड़ लोग उसके साथ चल रहे हैं, लेकिन पारंपरिक आलोचकगण पीछे छूट गए हैं। साहित्य के प्रसारण के नए माध्यमों को, इसके नए-नए रूपों को, इसके मूल्यों के नए वाहकों को वे रेखांकित नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि साहित्य को पसंद करने वाले लोग बहुत कम हो गए हैं।