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Pramod Ranjan deposited कदम सोच के रखें: दूरास्त् पर्वतानि रम्यते in the group
Literary Journalism on Humanities Commons 3 years, 1 month ago प्रमोद रंजन की चर्चित पुस्तक “शिमला डायरी” एक सुन्दर साज-सज्जा वाली पुस्तक है। सौम्य परिवेश की पृष्टभूमि, हरियाली, फूलों और किन्हीं ऐतिहासिक इमारतों, जन-जीवन के खुलते पन्नों की एक सुन्दर किताब के साथ तीन उपशीर्षकों ‘आलोचना, ‘कहानी-कविताएं’ व ‘मौखिक इतिहास’ के ऊपर “शिमला डायरी” पहली नज़र में ही पाठकों को आकर्षित करती है।
यह डायरी न केवल अपनी कठिनाइओं से विरेचन की राहें तलाशती है, अपितु पहाड़ के जन-जीवन की दिन-दैन्य की मुश्किलों, पहाड़ी संस्कारों, रीति-रिवाज़ों, परिवर्तनांकांक्षी नयी पीढ़ी की अभिलाषाओं व राजनैतिक-सामाजिक प्रभावों के विभिन्न आयामी संगठनों-नारों का भी विशलेषण करती चलती है (इधर से ही काफ़िला-ए-इंकलाब गुज़रेगा -पृ.सं.-140) एवं मौखिक-इतिहास-खण्ड-5 में विभिन्न साक्षात्कार से पहाड़ी संस्कृति के विविध पहलुओं रस्मो-रियाज़ों, वैवाहिक प्रथाओं को जानने के इच्छुक पाठकों के लिए “शिमला डायरी” विशेष रूप से पठनीय पुस्तक है; जिसमें हिमाचल के दूरवर्ती क्षेत्रों में जन-जीवन की आवश्यकताओं, कठिनाइयों, रिवायतों, मंदिरों, मेलों व धार्मिक उत्सवों-महोत्सवों के साथ ही वहां के नारी-जीवन की समस्याओं का व्यापक ज्ञान एक जिज्ञासु की पारखी दृष्टि से किया गया है। यही नहीं लेखक अपने पैतृक-प्रदेश बिहार अथवा अन्य मैदानी इलाकों के जन-जीवन में आने वाली कठिनाइयों से भी पाठकों का साक्षात्कार इस डायरी के माध्यम से करवाना नहीं भूलता। मूलतः इन सब के साथ लेखक का गूढ़ नाता उनके लेखकीय सन्दर्भों व पत्रकारिता की दृष्टि से ही इस पुस्तक में उद्घाटित हुआ है।