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Pramod Ranjan deposited साहित्य में त्रिवेणी संघ और त्रिवेणी संघ का साहित्य in the group
Philosophy on Humanities Commons 3 years, 2 months ago त्रिवेणी संघ की सक्रियता का काल 1933 से लेकर 1942 ईसवी तक माना जाता है। इस समय ”बीसवीं सदी अपने शैशवकाल को समाप्त कर युवावस्था को प्राप्त कर रही थी। ’जागरूक होते पिछड़े-दलित समुदायों और उनके दमन, शोषण की चौतरफा कोशिश के बीच जन्मे त्रिवेणी संघ का ”उद्देश्य तथा कार्यक्रम शोषित, शासित तथा दलित यानी सभी अनुन्नत समाज की उन्नति’’ था। उसने उद्घोष किया – ”जमीन किसकी है? जमीन हल चलाने वाले किसानों की है।’’ संघ ने अनुन्नत समाज के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक तीनों क्षेत्रों में आंदोलन चलाया।
कथा कहो कुंती माई’ और ‘ढोड़ाय चरितमानस’ के अतिरिक्त अन्य अनेक ऐसे उपन्यास, कहानियां और कविताएं हैं, जिन पर त्रिवेणी संघ के आंदोलन का प्रभाव है। रेणु के उपन्यासों और कहानियों पर भी त्रिवेणी संघ की छाया दिखाई देती है। त्रिवेणी संघ के प्रथम प्रदेश अध्यक्ष दासू सिंह का चरित्र-चित्रण करती प्रेमकुमार मणि की एक कहानी है – ‘उसका वोट’। उनके उपन्यास ‘ढलान’ में भी त्रिवेणी संघ पर एक लंबा प्रसंग है। और भी अनेक रचनाएं होंगी। स्वातंत्र्योत्तर काल के अनेक हिंदी लेखकों पर इस आंदोलन का गहरा वैचारिक प्रभाव रहा है।
लेकिन त्रिवेणी संघ ‘हिंदी आलोचना’ से गायब है। साहित्य पर व्यापक प्रभाव के बावजूद ‘हिंदी आलोचना’ में इसका उल्लेख तक नहीं मिलता।
हिंदी की कथित ‘मार्क्सवादी, प्रगतिशील, जनपक्षधर’ आलोचना द्वारा साहित्य पर संघ के प्रभावों की उपेक्षा का क्या कारण हो सकता है? क्या इस संघ का दर्शन पूंजीवादी, प्रतिगामी और जनविरोधी था? इस आलेख में इन प्रश्नों का उत्तर तलाशने की कोशिश करते हुए कहा गया है कि इसका कारण बहुजन-आलोचना दृष्टि का अभाव है।