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Pramod Ranjan deposited किन्नरों की अस्मिमा : पार्टनर आपकी पक्षधरता क्या है? on Humanities Commons 3 years, 5 months ago
वर्ष 2007 में मधुर भंडारकर की फिल्म ‘ट्रैफिक सिग्नल’ आई थी। इस फिल्म में शहरों में हाशिए पर रहने वाली जिंदगियों का चित्रण था। फिल्म में छोटे-मोटे काम करने वाले, भीख मांग कर गुजारा करने वालों के साथ किन्नरों के त्रासद जीवन को भी दिखाया गया था। उस समय हिमाचल प्रदेश के कुछ लेखकों ने फिल्म में हिजड़ों को किन्नर कहने का का पुरजोर विरोध किया था। परिणामस्वरूप हिमाचल सरकार ने अपने राज्य में फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी।
उन लेखकों का कहना था कि हिमाचल प्रदेश में किन्नौर नामक एक जिला है, जहां लोगों को किन्नर कहा जाता है। हिजड़ों को किन्नर कहने से उस जिले के लोगों का अपमान होता है।
हिंदी क्षेत्रों में ट्रांसजेंडर समुदाय को सामन्यत: हिजड़ा, छक्का आदि अपमानजक नाम से संबोधित किया जाता रहा है। साहित्य व अन्य कला-रूपों में भी इनकी माजूदगी सामान्यत: घृणा अथवा जुगुप्सा जगाने वाले पात्र के रूप में ही रही है।
सन् 2000 के आसपास से उन्हें किन्नर कहा जाने लगा है, जो एक सम्मानजनक संबोधन है। इसका अर्थ है जो न नर हैं, न नारी। ट्रांसजेंडर के अर्थ में यह इस शब्द का नया प्रयोग है।
इस शब्द का रिश्ता किन्नौर जिले के लोगों से कभी नहीं रहा। वहां के लोगों को कभी किन्नर नहीं गया है। वहां के लोगों को किन्नौरी अथवा किन्नौरा कहा जाता है।
इस आलेख में कहा गया है कि हिजड़ों के लिए किन्नर जैसा किंचित सम्मानजनक शब्द का प्रयोग किए जाने का विरोध करने वाले लेखकों की मानसिकता संकीर्ण और सामाजिक न्याय की विरोधी थी।