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Pramod Ranjan deposited यात्रा वृतांत: महोबा में महिषासुर in the group
Religious Studies on Humanities Commons 3 years, 5 months ago यह बुंदेलखंड स्थित महोबा का यात्रा संस्मरण है।
इसमें लेखक पौराणिक मिथक महिषासुर से संबंधित स्थलों की खोज में निकलता है।
वर्ष 2011 में जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों द्वारा महिषासुर को दलित, पिछड़े और आदिवासियों का पौरणिक नायक के रूप से प्रचारित किए जाने के बाद हंगामा खड़ा हो गया था। लेखक उस समय एक पत्रिका में प्रबंध-संपादक के रूप में कार्यरत था। उसी पत्रिका में पहली महिषासुर के भारत के वंचित तबकों का नायक होने से संबंधित सामग्री प्रकाशित हुई थी। वर्ष 2014 में पत्रिका पर हिंदुत्ववादी शक्तियों द्वारा मुकदमा दर्ज करवा दिया गया है तथा यह प्रचारित किया कि पत्रिका ने महिषासुर के संबंध मे झूठी जानकारी प्रकाशित की है, जिससे कुछ लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची है। मुकदमे में यह भी कहा गया कि पत्रिका ने “ब्राह्मणों और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी)” के बीच वैमनस्य फैलाने की काेशिश की है। 2016 में इससे संबंधित मामला भारतीय संसद में उठा। विवाद इतना बढ़ा दिया कि संसद में कई दिनों तक हंगामा होता रहा।इसी पृष्ठभूमि में लेखक ने उपरोक्त यात्रा की थी। इसमें महोबा क्षेत्र में महिषासुर से संबंधित पुरातत्विक स्थलों तथा उससे संबंधित लोक आस्था के अन्य स्थलों के बारे में बताया गया है। लेखक ने इस यात्रा के दौरान महसूस किया कि बहुजन समुदाय की संस्कृति को सिर्फ ब्राह्मणवादी शक्तियों ने ही नहीं कुचला है, बल्कि मुसलमान आक्रमणकारी भी इसमें पीछे नहीं रहे थे। ललित निबंध की शैली में लिखे गए इस संस्मरण में बहुजन संस्कृति के अनेक पहलुओं की चर्चा है।