• यह पत्र नई दिल्ली से प्रकाशित फारवर्ड प्रेस नामक द्विभाषी पत्रिका  और पुस्तक प्रकाशन संस्थान  के मालिक को लिखा गया था।  यह पत्रिका वर्ष 2011 से 2016  के बीच अपने तार्किक तेवर और दलित, आदिवासी व अन्य पिछड़े वर्गों की हिमायत करने के कारण चर्चित रही थी। पत्रिका ने अन्य अनेक कामों के साथ इस दौरान हिंदू मिथकों का दलित-बहुजन नजरिए से पुर्नपाठ प्रस्तुत किया, जिसकी गूंज भारतीय संसद में भी सुनाई दी और पत्रिका हिंदुत्ववादी शक्तियों के निशाने पर रही।  लेकिन, उसके बाद से इस पत्रिका का नैतिक पतन शुरू हो गया। भारतीय संसद में इस पत्रिका की चर्चा होने के बाद इसके मालिकों को कैनेडा समेत कई देशों से बड़ी मात्रा में चंदा मिलने लगा, जिसने उन्हें भ्रष्टचार के एक ऐसे दलदल में फंसा दिया, जहां बाहर निकलना न उनके लिए संभव है, न ही वे इसके लिए इच्छुक हैं। इस पत्र के लेखक ने उपरोक्त पत्रिका में वर्ष 2011 से 2019 तक प्रबंध-संपादक के रूप में काम किया था।  

    पत्र में बताने की कोशिश की गई है कि ऐसे कृत्यों से किस प्रकार सामाजिक समता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लैंगिक सखीपन से संबंधित वे नैतिक मूल्य नष्ट हो जाते हैं, जिन्हें ऐसी पत्रिकाएं समाज के सामने रखने के लिए जानी जाती हैं। यह पत्र एक केस स्टडी की तरह है, जिसे सिर्फ एक पत्रिका तक सीमित न रखकर पत्रकारिता और प्रकाशन जगत मे व्याप्त अनैतिकता के संदर्भ में भी देखा-समझा जा सकता है।