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Pramod Ranjan deposited वैज्ञानिक सोच को झटका किया जाना चाहिए या हलाल? in the group
Cultural Studies on Humanities Commons 3 years, 6 months ago पूर्वी दिल्ली नगर निगम ने 27 दिसंबर, 2018 को आदेश जारी किया कि उसके क्षेत्र में आने वाली, कच्चा और पका चिकन और मीट बेचने वाली सभी दुकानों और रेस्तरांओं को एक बोर्ड लगवाना होगा। जिस पर साफ और बड़े अक्षरों में लिखना हो कि यहां झटका मीट मिलता है या हलाल। नगर निगम पर भाजपा का कब्जा है।भाजपा का तर्क है कि “पूर्वी दिल्ली में बड़ी संख्या में हिंदू और सिख रहते हैं। इनके धर्म में हलाल पद्धति से वध किए गए पशु का मीट खाना पाप है। इसी प्रकार मुसलमान झटका मीट खा लें तो दोजख में सड़ेंगे।”
हलाल और झटका मीट का बोर्ड लगाए रेस्तरांओं की योजना अगर निर्विरोध परवान चढ़ गई तो यह रास्ता हमें कहाँ ले जाएगा?
परंपरागत रूप से ऊंची हिंदू जातियों का धर्म नीची जातियों के हिंदुओं और मुसलमानों का छुआ खाना खाने से भ्रष्ट हो जाता है। क्या उन्हें पाप से बचाने के लिए होटलों के साइन बोर्ड में मालिक की जाति-धर्म और वेटरों के नेमप्लेट में उनके नाम के साथ उनकी जाति का उल्लेख किया जाएगा?
हर जाति के लिए अलग रेस्तरां, अलग स्कूल, अलग यूनिवर्सिटी, अलग ट्रेन, अलग स्पा, अलग स्विमिंग पूल, अलग ब्यूटी पार्लर की कल्पना भी कितनी खौफनाक है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमें रक्त-शुद्धता और बौद्धिक जहालत की अंधी गली में वापस ले जाना चाहता है। लेकिन तर्क बल से हीन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन को परास्त करना बहुत कठिन नहीं है। इस गली से बाहर निकलने का रास्ता हमें फुले, आंबेडकर, भदंत बोधानंद, पेरियार, जेएनपी मेहता, राम स्वरूप वर्मा आदि के तेजस्वी विचारों ने दिखाया है।